शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

त्रिफला अनुपान

🌹✍🏻       त्रिफला अनुपान             ✍🏻🌹
जासु कृपा कर मिटत सब आधि,व्याधि अपार

तिह प्रभु दीन दयाल को बंदहु बारम्बार

🌳🌺महिला संजीवनी 🌺🌳

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नमस्कार दोस्तों लोग त्रिफला की सेवन बिधि पूछते है कि सर कैसे सेवन करे उसके लिए ये अनुपान बिधि दी है इसी के हिसाब से सेवन करे

सर्वश्रेष्ठ त्रिफला अनुपान (सहौषधि)
स्वास्थ्य स्थिति और उपयोग के उद्देश्य के अनुसार त्रिफला के सहायक (अनुपान) अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ उदाहरण के लिए स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार एक तालिका दी गयी है।

स्वास्थ्य की स्थिति सहौषधि (अनुपान)

वात  विकार- सुबह गर्म पानी और रात में सामान्य पानी या तिल का तेल
पित्त विकार- ठंडा पानी या घी (गाय का दूध वसा)
कफ विकार - गर्म पानी या शहद
वजन घटना - गरम पानी
खांसी - शहद
सामान्य जुखाम - शहद और त्रिकटु चूर्ण
सामान्य टॉनिक और कायाकल्प के लिए या पूरक के रूप में दूध
बाल झड़ना - शहद और मुलैठी चूर्ण
आँखों की समस्याएँ - शहद

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🌳🕉🌺महिला संजीवनी 🌺🕉🌳
गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
जिला -एटा , उत्तर प्रदेश
9466623519
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आँख की रौशनी ✍🏻

🌹✍🏻    आँख की रौशनी           ✍🏻🌹
जासु कृपा कर मिटत सब आधि,व्याधि अपार

तिह प्रभु दीन दयाल को बंदहु बारम्बार

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मैं एक बुढ़िया से मिला था....लगभग 80 साल की थीं वे....गेहूँ में से कंकड़ बीनने का काम करती थीं....तारीफ़ ये कि बगैर चश्मे के... न उन्हें निकट दृष्टिदोष और न ही दूर दृष्टि दोष...कारन पूछनेपर उन्होंने मुझे बताया कि वे काफी दिनों से एक साधू के कहने पर अपनी आँखों में सहजन के 1-2 फूल अथवा पत्तियों को मसलकर उनसे निकलनेवाले रस को आँजती थीं...उनकी आँखों के स्वास्थ्य का ये राज था....सहजन का लेटिन नाम है- Moringa oleifera है....

नोट - बाल झड़ना , पथरी , pcod , थाइराइड , गुप्त रोग की दवा के लिए संपर्क करे

गुरुभाई
9466623519
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गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
जिला -एटा , उत्तर प्रदेश
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अस्थमा ,दमा व श्वास का घरेलू उपचार

🌹✍🏻    अस्थमा ,दमा व श्वास का घरेलू उपचार               ✍🏻🌹
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तिह प्रभु दीन दयाल को बंदहु बारम्बार

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दमा व श्वास का घरेलू उपचार
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एक पका केला छिला लेकर चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर उसमें एक छोटा चम्मच दो ग्राम कपड़छान की हुई काली मिर्च भर दें । फिर उसे बगैर छीलेही, केले के वृक्ष के पत्ते में अच्छी तरह लपेट कर डोरे से बांध कर 2-3 घंटे रख दें । बाद में केले के पत्ते सहित उसे आग में इस प्रकार भूने की उपर का पत्ता जले । ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें ।प्रतिदिन सुबह में केले में काली मिर्च का चूर्ण भरें। और शाम को पकावें । 15-20 दिन में खूब लाभ होगा ।

केला के पत्तों को सुखाकर किसी बड़े बर्तन में जला लेवें। फिर कपड़छान कर लें और इस केले के पत्ते की भरम को एक कांच की साफ शीशी या डिब्बे में रख लें । बस, दवा तैयार है ।

सेवन विधि - एक साल पुराना गुड़ 3 ग्राम चिकनी सुपारी का आधा से थोड़ा कम वनज को 2-3 चम्मच पानी में भिगों दें । उसमें 1-4 चौथाई दवा केले के पत्ते की राख डाल दें और पांच-दस मिनट बाद ले लें । दिनभर में सिर्फ एक बार ही दवा लेनी है, कभी भी ले लेवें ।

बच्चे का असाध्य दमा - अमलतास का गूदा 15 ग्राम दो कप पानी में डालकर उबालें चौथाई भाग बचने पर छान लें और सोते समय रोगी को गरम-गरम पिला दें । फेफड़ों में जमा हुआ बलगम शौच मार्ग से निकल जाता है । लगातार तीन दिन लेने से जमा हुआ कफ निकल कर फेफड़े साफ हो जाते है । महीने भर लेने से फेफड़े कर तपेदिक ठीक हो सकती है ।

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गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
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प्रोस्टेट समस्या

🌹✍🏻       प्रोस्टेट समस्या           ✍🏻🌹

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तिह प्रभु दीन दयाल को बंदहु बारम्बार

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🌺🙏🏻🌺 *!! विना आपरेशन प्रोस्टेट ग्लैंड ग्रंथि का आयुर्वेदिक इलाज !!* 🌺🙏🏻🌺

- आयु बढ़ने के साथ ही पुरुषों में अक्सर यह समस्या हो जाती है !
प्रोस्टेट ग्लैंड पुरुषों में पाई जाने वाली अखरोट के साइज़ की ग्रंथि है जो मूत्राशय के निचे मूत्र मार्ग को कवर करती है ! यह एक तरह से वाल्व की तरह काम करती है ! जो पेशाब करने और पेशाब रोकने के फंक्शन को कण्ट्रोल करता है !!

प्रोस्टेट ग्लैंड की सामान्य वृद्धि को अंग्रेज़ी में मृदु प्रोस्टेटिक हाइपर प्लेसिया या बीपीएच कहा जाता है ! यह वृद्धि आगे चलकर प्रोस्टेट कैंसर का रूप ले सकती है !!
प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि होने पर कुछ समस्या और लक्षण उप्तन्न होते हैं जैसे - पेशाब करने में दर्द होना , बार - बार पेशाब होना , एक बार में पूरी तरह खुल कर पेशाब नहीं होना , पेशाब बंद होना , बूंद- बूंद पेशाब होना , पेशाब रोक नहीं पाना, इन्फेक्शन होना इत्यादि !!
सोनोग्राफी से इसके साइज़ का सही पता चलता है ! डॉक्टर लोग अक्सर इसमें ऑपरेशन की सलाह देते हैं ! पर आप को बता दें कि बिना ऑपरेशन यह ठीक हो जाता है !!

*!! योग नंबर एक !!*

कांचनार गुगुल , गोक्षुरादी गुगुल और चन्द्रप्रभा वटी तीनों 1 -1 सुबह शाम गिलोय के रस गोली या काढ़े के साथ लें !!

*!! योग नंबर दो !!*

  वंग भस्म 10 ग्राम , गोदंती भस्म 20 ग्राम और शुद्ध नौसादर , उटंगन बिज का चूर्ण , शीतलचीनी चूर्ण प्रत्येक 50 ग्राम सभी को अच्छी तरह मिक्स कर 1 - 1 चम्मच ( तीन ग्राम तक ) भोजन के बाद सुबह शाम मधु या पानी के साथ ले !!
बताये गये दोनों योग का साथ में इस्तेमाल करना है ! योग नंबर 1 की औषधियां बनी बनायीं आयुर्वेदिक स्टोर में मिल जाती है !!
अगर योग नंबर दो नहीं बना पा रहे हों तो इसके जगह पर ' बंगशील ' और ' फोर्टेज ' 2 - 2 टेबलेट सुबह शाम लेना चाहिए ! यह अलार्सिन कंपनी की दवा है ! जो आयुर्वेदिक मेडिकल स्टोर में मिल जाएगी !!
इन औषधियों के प्रयोग से पहले हफ्ते से ही पेशाब की प्रॉब्लम में फ़ायदा दिखने लगता है ! और कुछ महीनों के लगातार इस्तेमाल से प्रोस्टेट ग्लैंड नार्मल हो जाता है !! और ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती ! कई रोगियों पर प्रयोग कर सफ़ल पाया है !!
- इसके प्रयोग अवधि में बीच - बीच में सोनोग्राफी से प्रोस्टेट ग्लैंड का साइज़ पता करते रहना चाहिए !!

तो मित्रों यह था बिना ऑपरेशन प्रोस्टेट ग्लैंड वृद्धि को ठीक करने का सफ़ल आयुर्वेदिक योग  !!

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गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
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रुद्रवन्ती

🌹✍🏻       रुद्रवंती (रुदंती)           ✍🏻🌹

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रुद्रवंती (रुदंती) – Rudravanti (Rudanti)

रुद्रवंती - रुदंती

रुद्रवंती (रुद्रवन्ती) को रुदंती भी कहा जाता है। यह आयुर्वेद में एक रसायन और क्षयकृमिनाशक माना जाता है। इस का प्रयोग क्षय रोग, कास, श्वास (asthma) और अन्य श्वसन प्रणाली की बीमारियों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। यह आंतरिक शक्ति और शारीरिक शक्ति को बढ़ाता है। शरीर को बल प्रदान कर शारीरिक कमजोरी को दूर करता है।


इसका मुख्य प्रभाव फेफड़ों पर होता है। यह फेफड़ों में होने वाले घाव के इलाज के लिए अति उपयुक्त दवा है। यह एक कफहर और जंतुघ्न हर्ब है जो श्वसन प्रणाली में होने वाले संक्रमणों में भी लाभकारी है।

यक्ष्मा रोग में इसका प्रयोग स्वर्ण भस्म या वसंत मालती रस (स्वर्ण युक्त) के साथ करने पर यह उत्तम लाभ करता है। यह राजयक्ष्मा के जीवाणुओं की वृद्धि रोक देता है और उनका नाश करता है।

खांसी में यह तब प्रयोग करना चाहिए जब छाती में कफ जमा हो या छाती में से घरघराहट या सीटी बजने जैसी आवाज आये। यह दमा रोग में सीने में होने वाली जकड़न में भी प्रभावी है और सांस की तकलीफ को दूर करती है।

यदि रोगी को गले में खुजली या खरखराहट के बाद खांसी हो रही हो तो इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि यह रुक्ष होती है और गले की खरखराहट और बड़ा सकती है। ऐसी अवस्था में वासापत्र का प्रयोग मुलेठी, प्रवाल पिष्टी आदि के साथ करने से ज्यादा लाभ मिलता है। यदि कभी इस का प्रयोग करना भी पड़े तो इसको दूध के साथ देना चाहीहे या अन्य औषधियों के साथ मिलकर देना चाहिए।


सर्भ प्रथम इसका प्रयोग शांग्रधर संहिता में मिलता है। इस संहिता में इसे रसायन कहा गया है।

रुद्रवंती के बारे में विवाद
रुद्रवन्ती की वास्तविक प्रजाति के बारे में सूचना विवादास्पद है। हिंदी में रुद्रवंती या रुदंती कही जाने वाली ३ जड़ी बुटीयां है।

Astragalus Candoleanus
Capparis Moonii
Cressa Cretica
हालांकि इन तीनो के औषिधीय गुण कर्म और औषिधीय प्रयोग एवं लाभ में लगभग समानता है और यह सब उष्ण वीर्य है।

यह भी देखें  सौंफ (Saunf) के अद्भुत फायदे, प्रयोग, गुण-कर्म, सेवन विधि और दुष्प्रभाव के बारे में जानें
Capparis Moonii के फल ही बाजार में उपलब्ध होते है और रुदंती या रुद्रवंती के नाम से बेचे जाते है। इन्हीं का प्रयोग अधिक होता है। क्योंकि यह बाजार में आसानी से मिल जाती है और हम इसी का प्रयोग अपने क्लिनिक पर करते है। इसमें सभी गुण है जो इस लेख में लिखे गए है। यक्ष्मा रोग (टी.बी.) में ख़ास तौर पर फायदेमंद है।

Cressa Cretica एक बहुत ही दुर्लभ हर्ब है जो हिमालयी क्षेत्र में मिलती है। यह कदाचित ही प्रापत होती है। इसके गुणों और Capparis Moonii के गुणों में ज्यादा समानता है।

Astragalus Candoleanus उत्तराखंड में मिलने वाली बूटी है जिसका प्रयोग भी श्वसन प्रणाली और पेट के रोगों में किया जाता है। ऐसे भी रुद्रवंती कहा जाता है।

उपयोगी अंग (Medicinal Parts)
Capparis Moonii: फल
Cressa Cretica: पंचांग विशेषतः पत्ते और शाखाएं
आयुर्वेदिक गुण धर्म एवं दोष कर्म
रस (Taste) कटु, तिक्त,
गुण (Property) लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण
वीर्य (Potency) उष्ण (गरम)
विपाक (Metabolic Property) कटु
दोष कर्म (Dosha Action) वात – कफ शामक, पित्त संशोधक
औषधीय कर्म (Medicinal Actions)
रुद्रवंती (रुदंती) में निम्नलिखित औषधीय गुण है:

क्षयकृमिनाशक
रक्तपित्तघ्न
रसायन
कफहर
श्वासहर
प्रमेहहर
कासहर
श्लेष्मपूतिहर
पाचन – पाचन शक्ति बढाने वाली
अनुलोमन
दीपन
पितसारक
ज्वरहर
आमपाचन
कोथप्रश्नम
जंतुघ्न
जीवाणु नाशक
जीवनीय
रसायन
रक्तवर्धक
चिकित्सकीय संकेत (Indications)
रुद्रवंती निम्नलिखित व्याधियों में लाभकारी है:

कास
श्वास – दमा (अस्थमा)
यक्ष्मा (tuberculosis)
पुरानी खांसी
ज्वर सहित खांसी
फेफड़ों के संक्रमण
प्रमेह
नव ज्वर
औषधीय लाभ एवं प्रयोग (Benefits & Uses)
रुद्रवन्ती (रुदन्ती) का मुख्य प्रयोग टी.बी. की चिकित्सा में किया जाता है। इसका जीवाणुनाशक गुण टी.बी. के जीवाणु की वृद्धि रोक देता है और इस का नाश करता है। यह श्वसन प्रणाली के अन्य संक्रमणों में भी उत्तम लाभ करता है। कास और श्वास के यह एक बहुत ही फायदेमंद औषिधि है।

सर्दी, जुकाम और बुखार
रुद्रवंती का चूर्ण सर्दी, जुकाम और बुखार में लाभदायक है। यह सर्दी जुकाम के लक्षणों को कम करता है और बुखार उतारता है। यह बुखार में होने वाले बदन दर्द और सिर दर्द को चिरायता की तरह ही कम कर देता है। यह बार बार होने वाली छींके, नजला और नाक के बंद होने में आराम करता है।

सर्दी, जुकाम और बुखार में रुदंती का चूर्ण 1 से 2 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ लिया जा सकता है।  या फिर इस का क्वाथ बना कर प्रयोग किया जा सकता है। काढ़ा बनाने के लिए 10 ग्राम फल चूर्ण या पंचांग को 240 मिलीलीटर पानी में डाल कर उबाले और जब यह कम हो कर 60 मिलीलीटर करीब रह जाये तो छान कर सुबह और शाम को लें। यह भोजन के 1 घंटे बाद लिया जा सकता है।

बलगम वाली खाँसी
रुद्रवंती बलगम वाली खाँसी में बहुत लाभकर है। यह श्वास नलियों की सूजन को कम करता है। बलगम बनना कम करता है और बनी हुई बलगम को बाहर निकालने में मदद करता है। अच्छे परिणाम के लिए इसका प्रयोग हरीतकी, तुलसी और कंटकारी या बिभीतकी या त्रिकटु चूर्ण के साथ किया जा सकता है।


अगर बलगम कुछ चिकनी सी और पीले भूरे या हरे रंग की हो या बलगम में रक्त हो, तो रुद्रवंती का अकेले प्रयोग न करना ही उचित है। या फिर ऐसी अवस्था में इसको कम मात्रा में मुलेठी, प्रवाल पिष्टी, वासापत्र, और बनफ्शा के साथ करने से उचित लाभ मिलता है।

दमा या साँस संबंधित समस्याएँ
रुद्रवन्ती दमा रोगी के लिए भी लाभदायी है। यदि  छाती में घरघराहट जा सिटी बजने के सामान आवाज आए और फेफड़ों या श्वास नलियों में बलगम जमा हुआ हो तो यह अधिक लाभ करती है। यह बलगम उत्पादन कम कर देती है और श्वास नलियों को खोल देती है जिस से साँस लेने में आसानी होती है। ऐसे केस में इसको शहद या गरम पानी के साथ लिया जा सकता है।

यदि मरीज को सांस लेने में तकलीफ हो और बलगम का स्राव और उत्पादन सामान्य हो, तो इसे गर्म दूध के साथ लिया जाना चाहिए।

क्षयरोग
क्षयरोग में रुद्रवन्ती क्षय के जीवाणुओ की वृद्धि को रोकता है और उनका नाश करता है। रक्त की विषाक्तता को दूर करता है। यह फेफड़ों के घावों को भी कम करने में सहायक है। रुदंती के फल का लगातार ६ माह प्रयोग करने से फेफड़ों के घाव पूरी तरह ठीक हो जाते है और एक्स-रे के द्वारा जांच करने पर घाव दिखाई नहीं पड़ते।

क्षयरोग में रुद्रवन्ती चूर्ण को 3 से 6 ग्राम की मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इससे वजन बढ़ता है, भूख लगती है और शारीरिक कमजोरी दूर हो कर शरीर को ताकत मिलती है। यह बदन दर्द और थकान को भी कम करता है।

मात्रा एवं सेवन विधि (Dosage)
रुद्रवंती फल चूर्ण की सामान्य औषधीय मात्रा  व खुराक इस प्रकार है:

औषधीय मात्रा (Dosage)
बच्चे 500 मिलीग्राम से 1.5 ग्राम
वयस्क 1 से 3 ग्राम (कभी कभी 6 ग्राम तक भी दिया जा सकता है।)
सेवन विधि
दवा लेने का उचित समय (कब लें?) सुबह और शाम
दिन में कितनी बार लें? 2 या 3 बार
अनुपान (किस के साथ लें?) रोग अनुसार अनुपान – शहद (मधु), गुनगुने पानी या दूध के साथ
उपचार की अवधि (कितने समय तक लें) कम से कम 6 से 12 महीने
आप के स्वास्थ्य अनुकूल रुद्रवंती की उचित मात्रा के लिए आप अपने चिकित्सक की सलाह लें।

दुष्प्रभाव (Side Effects)
यदि रुद्रवंती चूर्ण का प्रयोग व सेवन निर्धारित मात्रा (खुराक) में चिकित्सा पर्यवेक्षक के अंतर्गत किया जाए तो रुद्रवंती के कोई दुष्परिणाम नहीं मिलते। अधिक मात्रा में रुद्रवंती के साइड इफेक्ट्स की जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है।

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गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
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बोलबद्ध रस

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बोलबद्ध रस शरीर से कहीं से भी निकलते हुवे रक्त को बंद करने के लिए प्रयोग किया जाता है. इसके इस्तेमाल से नाक, मुंह, गुदा, योनी या शरीर के किसी भी भाग की इंटरनल या एक्सटर्नल ब्लीडिंग रूकती है. तो आईये जानते हैं इसका कम्पोजीशन, फ़ायदे और इस्तेमाल की पूरी जानकारी -

बोलबद्ध रस जैसे कि इसके नाम से ही पता चलता है यह रस यानि रसायन औषधि है जिसमे शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, गिलोय सत्व एक-एक भाग, खूनखराबा तीन भाग और सेमल के छाल के रस का मिश्रण होता है

बनाने का तरीका यह होता है कि सबसे पहले शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक को अच्छी तरह से खरलकर कज्जली बना लें और इसमें खूनख़राबा जिसे हीरा-दोखी भी कहते हैं का चूर्ण मिक्स कर सेमल के छाल के रस की भावना देकर 250 mg की गोलियाँ बनाकर सुखाकर रखा जाता है

बोलबद्ध रस के फ़ायदे-

जैसा कि शुरू में मैंने बताया शरीर में कहीं से भी होने वाली ब्लीडिंग में इसके इस्तेमाल से फ़ायदा होता है

पित्त बढ़ने से नकसीर हो या नाक की ब्लीडिंग हो, बवासीर-फिश्चूला के कारन ब्लीडिंग हो, टी. बी. के कारन मुंह से ब्लीडिंग हो, या फिर महिलाओं की गर्भाशय की विकृति के कारन ब्लीडिंग हो तो इसका इस्तेमाल करना चाहिए

रक्त प्रदर, और पुरुषों के पेशाब के साथ खून आने पर भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. ब्लीडिंग रोकने की यह प्राइमरी मेडिसिन है, पर ब्लीडिंग के दुसरे कारणों को पता कर उसकी दवा भी लेनी चाहिए

बोलबद्ध रस की मात्रा और सेवन विधि -

एक से दो गोली दिन में दो-तिन बार तक शहद या दूब घास के रस के साथ लेना चाहिए, या फिर आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से रोगानुसार अनुपान के साथ लेना चाहिए.

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गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
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चन्द्रप्रभा वटी

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आयुर्वेद की महान शास्त्रीय औषधियों में से एक चन्द्रप्रभा वटी वीर्य विकार और मूत्र सम्बन्धी रोगों के लिए सुप्रसिद्ध है. आज मैं आपको इसके गुण उपयोग और निर्माण विधि के बारे में डिटेल में बताऊंगा.

तो आईये सबसे पहले जानते हैं इसके गुण और उपयोग-

चंद्रप्रभा वटी मूत्र संसथान के रोग और वीर्य विकारों के सुप्रसिद्ध है. यह बल को बढ़ाती तथा शरीर का पोषण कर शरीर की कान्ति बढ़ाती है. प्रमेह और उनसे पैदा हुवे उपद्रवों पर इसका धीरे-धीरे स्थाई प्रभाव होता है.

सुज़ाक इत्यादि के कारण मूत्र और वीर्य में जो विकार पैदा होते हैं, उन्हें यह नष्ट कर देती है. शौच-पेशाब के साथ वीर्य का गिरना, बहुमूत्र, श्वेत प्रदर, वीर्य दोष, प्रोस्टेट ग्लैंड बढ़ने में, पेशाब में जलन, पत्थरी, अंडवृद्धि, बवासीर, कमर दर्द, आँखों के रोग, स्त्री और पुरुष के रोगों में चंद्रप्रभा वटी से बहुत लाभ होता है.


आईये अब जानते हैं इसके कुछ प्रयोग विभिन्न रोगों पर -

मूत्राशय रोगों में -

मूत्राशय में किसी प्रकार की प्रॉब्लम होने पर पेशाब में जलन होना, पेशाब का रंग लाल, पेडू में जलन, पेशाब में दुर्गन्ध अधिक हो, कभी कभी पेशाब में शर्करा या चीनी भी आने लगे तो इस हालत में चन्द्रप्रभा वटी बहुत बढ़िया काम करती है, क्यूंकि इसका प्रभाव मूत्राशय पर विशेष होने से इसकी प्रॉब्लम दूर होकर पेशाब साफ़ आने लगता है और जलन दूर होती है.


किडनी या वृक्क की समस्या में -

जब किडनी सही से काम नहीं करता तो पेशाब कम बनता है और इसके वजह से भयंकर रोग उत्पन्न हो सकते हैं. पेशाब कम होने पर पुरे बॉडी में एक तरह का ज़हर फ़ैल जाता है और कई तरह की प्रॉब्लम हो सकती है. क्यूंकि पेशाब से ही शरीर का कचरा निकलता है.

ऐसी स्थिति में चंद्रप्रभा वटी बहुत कारगर है, इसे 2-2 गोली तीन बार पुनर्नवारिष्ट के साथ लेना चाहिए.

स्वप्नदोष, पेशाब पैखाने के साथ वीर्य निकलने पर -

नवयुवकों यह समस्या ज़्यादा पाई जाती है. शुक्रवाहिनी नाड़ीयों की कमज़ोरी की वजह से.

स्वप्नदोष का आयुर्वेदिक फ़ार्मूला

अगर पेशाब या टॉयलेट के पहले या बाद में वीर्य निकल जाता हो. स्वप्नदोष हो जाता हो, या किसी सुन्दर स्त्री को देखते ही या बात चित करते ही वीर्य निकल जाता हो, शीघ्रपतन की समस्या हो तो ऐसी अवस्था में चन्द्रप्रभा वटी 2-2 गोली सुबह शाम गिलोय या गुरीच के काढ़े के साथ खाने से फायदा होता है.


सुज़ाक की बीमारी में -

पुराने सुज़ाक में भी इसका उपयोग किया जाता है. चन्द्रप्रभा वटी को चन्दनासव के साथ लेने से पुराने सुज़ाक में फायदा होता है इस से रिलेटेड रोग दूर होकर पेशाब साफ़ आने लगता है.

स्त्री रोगों और गर्भाशय की कमजोरी में -

चन्द्रप्रभा वटी पुरुष रोगों के साथ-साथ स्त्री रोगों में भी फ़ायदेमंद है. यह गर्भाशय को शक्ति प्रदान कर उसकी विकृति को दूर कर के शरीर निरोग बना देता है. ज़्यादा सेक्स करने या अधिक संतान होने से कमज़ोर स्त्री के लिए यह बहुत ही फ़ायदेमंद है. शरीर में दर्द और पीरियड्स में दर्द होने पर भी लाभकारी है.

कुल मिलाकर देखा जाये तो चन्द्रप्रभा वटी स्त्री पुरुष के रोगों के लिए महान दवा है जो हज़ारों साल पहले भी असरदार थी और आज भी काम करती है.


यह दवा बनी बनाई मार्केट में मिल जाती है, आयुर्वेदिक कंपनियां इसका निर्माण करती हैं.

चन्द्रप्रभा वटी निर्माण विधि-

सिद्ध योग संग्रह का यह फ़ार्मूला है. इसके लिए आपको ये सब चाहिए होगा - कपूरकचरी, बच, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारू-हल्दी, चित्रकमूल छाल, धनियाँ, बड़ी हर्रे, बहेड़ा, आंवला, चव्य, वायविडंग, गजपीपल, छोटी पीपल, सोंठ, काली मिर्च, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सज्जी खार, यवक्षार, सेंधा नमक, सोंचर नमक, सांभर नमक, छोटी ईलायची के बीज, कबाबचीनी, गोखुरू और सफ़ेद चन्दन प्रत्येक 5-5 ग्राम 
निशोथ, दन्तिमूल, तेज़पात, दालचीनी, बड़ी इलायची, और बंशलोचन प्रत्येक 20-20 ग्राम

लौह भस्म 40 ग्राम, मिश्री 80 ग्राम, शुद्ध शिलाजीत और शुद्ध गुगुल प्रत्येक 160 ग्राम.

सभी जड़ी बूटियों का बारीक कपड़छन चूर्ण बना लें और गुगुल को इमामदस्ते में कूटें जब गुगुल नर्म हो जाये तो शिलाजीत, भस्म और जड़ी-बूटियों का चूर्ण मिला कर गिलोय के रस में तिन दिनों तक खरल में डाल कर मर्दन करना चाहिए. और इसके बाद 500 मिलीग्राम की गोलियां बना कर सुखा कर रख लें.

तो दोस्तों, आज आप ने जाना आयुर्वेदिक दवा चन्द्रप्रभा वटी के बारे में. कुछ बात समझ न आई हो तो कमेंट से मुझसे पूछिये.


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नाखून सड़ना ,पेरोनिसिया ,हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना.

  पेरोनिसिया  हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना. आयुर्वेदिक  मुलेठी 50ग्राम बडी सोफ 50 ग्राम  अच्छी हळदी 50 ग्राम  नीम पत्ते चुर्ण 50 ग्राम  ...