रविवार, 22 अक्टूबर 2017

नारायण चूर्ण !!

🌺🙏🏻🌺 *!! नारायण चूर्ण !!* 🌺🙏🏻🌺

*!! उदर रोग नाशक !!*

*!! प्रयुक्त सामग्री !!*
.अजवाइन, हाउबेर , सूखी धनिया, त्रिफला, कालाजीरा, सौफ, पीपरामूल , बनतुलसी, कचूर , सोया , बच , जीरा , त्रिकुट, चोक , चीता, जवाखार , सज्जीखार, पोहखरमूल, कुट, पाचों नोन, और वायविडंग सब एक एक तोला ! दन्ती तीन तोला , निसोथ और इंद्रायण दो दो तोले, और सातला चार तोले , इन सभी दवाऔं को कूटपीस कर कपड़छन कर शीशी में रख लें ! यही नारायण चूर्ण है !!

*मात्रा व सेवन विधि !!*
इस चूर्ण की मात्रा ३ से ४ मासे की है ! सुबह साम !!

*रोग अनुसार अनुपान !!*
*१ :-* उदर रोगों में छाछ /माठे के साथ !!
*२ :-* गुल्मरोगों में बेर के काढ़े के साथ !!
*३ :-* मल भेद में दही के तोड़ के साथ !!
*४ :-* बात रोग में प्रसन्ना मदिरा के साथ !!
*५ :-* बवासीर में अनार के रस के साथ !!
*६ :-* अजीर्ण में गरम जल के साथ !!
*७ :-* पेट और गुदा में कतरनी सी चलने पर , नींबू के रस के साथ अथवा तितडिक के भिगोये पानी के साथ !!

*चूर्ण सेवन से लाभ !!*
यह नारायण चूर्ण उदर के समस्त रोगों को ऐसे भगाता है जैसे शेर के आने पर जंगल के अन्य जानवर भागते हैं ! यह उदर रोगो की परमोत्तम औषधि है ! भिन्न भिन्न अनुपानो के साथ सेवन करने से यह उदररोग , गुल्म, वातरोग, मलभेद , परिकर्तिका, अजीर्ण , मंदाग्नि, पाण्डुरोग, भगन्दर , खांशी, श्वास , गलग्रह , ह्रदयरोग , संग्रहणी , कोढ़ , ज्वर, मूलविष, कृतिमविष, खनिजविष, और सब तरह के विषों को नाश करने वाला है !!

*नोट :-* रोगी को अपने बलाबल अनुसार स्वेदन , रेचन आदि क्रिया कर लेना चाहिए पीछे इस चूर्ण का लाभ लें !!

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सालों से बंद हुआ मासिक धर्म फिर से चालू करें !!* 🌺🙏🏻

🌺🙏🏻🌺 *!! सालों से बंद हुआ मासिक धर्म फिर से चालू करें !!* 🌺🙏🏻🌺

*सामग्री !!*
भारंगी, सोंठ, काले तिल बड़ीपीपर और कालीमिर्च ,  इन सबको बराबर दो तोले लेकर कूटकर पाव भर पानी में औटायें और दोतिहाई रहने पर छान कर गुनगुना पिये ! इस उपाय को रोज करते रहने से सालों से बंद हुआ रज फिर से सुरू हो जाता है !!

*योग परिक्षित है !!*

वैद्यवर विद्यापति जी कहतें हैं :-
*"भारंगीव्यौपयुत क्वाथस्तिलज: पुष्परोधहा"*

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आयुर्वेदिक गुग्गुल भाग २

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक गुग्गुल भाग २ !!* 🌺🙏🏻🌺

        *!! त्रयोदशांग गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* त्रयोदशांग गुग्गुल वात-शूल, गठिया, पक्षाघात, लकवा, गृध्रसीवात, अस्थि, सन्धि, मज्जागत व स्नायु आदि रोगों में लाभ करता है ! वात नाशक औषधियों के अनुपान के साथ देने से वातव्याधि नष्ट हो जाती है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ४ गोली, दिन में दो बार गर्म पानी या दूध के साथ !!

           *!! त्रिफला गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* त्रिफला गुग्गुल सब प्रकार के वातजशूल, भगन्दर, सूजन, बवासीर आदि रोगों में लाभदायक है ! इसके सेवन से पुरानी कब्ज, पेट में वायु भरना आदि में भी लाभ प्रदान करता है ! भगन्दर रोग में दस्त-कब्ज होने से रोग में बढ़ोत्तरी होती है ! जिस कारण दर्द व स्राव होने लगता है ! ऐसी दशा में त्रिफला गुग्गुल विशेष लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार त्रिफला क्वाथ या गो-मूत्र के साथ !!

         *!! गोक्षुरादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* गोक्षुरादि गुग्गुल प्रमेह, अश्मरी (पत्थरी), मूत्रकृच्छ (रूक- रूक कर पेशा आना), वात रक्त, शुक्रदोष, मूत्राघात, प्रदर रोग व मूत्राशय रोगों में लाभ करता है ! इसका विशेष असर मूत्राशय एवं मूत्रनली व वीर्यवाहिनी शिराओं पर होता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार गोखरू क्वाथ या प्रमेह हर क्वाथ के साथ !!

          *!! कैशोर गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* कैशोर गुग्गुल वात रक्त, घाव, खाँसी, कोढ़, गुल्म, शोथ, उदर रोग, पांडु, प्रमेह, अग्निमांद्य, विवंध, प्रमेह, पीड़िका, एकदोषज आदि में लाभ करता है ! इसके सेवन के साथ विशेष पथ्य परहेज की भी आवश्यकता नही होती ! इसका विशेष उपयोग वातरक्त, कुष्ठ व रक्त विकारों में किया जाता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार गर्म पानी या दूध अथवा मंजिष्ठादि क्वाथ के साथ !!

         *!! कचनार गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* कंचनार गुग्गुल गलगण्ड, गले में व नाक के भीतर गांठे बढ़ना, गण्डमाला (गले में कण्ठबेल होना) भगन्दर, अपची, ग्रन्थि, अर्बुद, व्रण, गुल्म, कुष्ठ आदि रोगों में लाभदायक है ! यह गांठ आदि का नाश करने के लिए विशेष उपयोग होता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार !!

        *!! एकविंशति गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* एकविंशति गुग्गुल सब प्रकार के कुष्ठ, कृमि, दाद, घाव, संग्रहणी विकार, बवासीर, मुख रोग आदि में विशेष लाभदायक है ! इसका विशेष उपयोग रक्त विकारों में किया जाता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ४ गोली, दिन में दो बार गर्म पानीया नीम की छाल के क्वाथ के साथ !!

       *!! आभा गुग्गुलु
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*गुण व उपयोग : -* आभा गुग्गुल , टूटी हुर्इ हड्डियों, मोच, छाती की चोट आदि में लाभदायक है ! यह पीड़ानाशक का उत्तम योग है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार गर्म पानी के साथ या दूध के साथ !!

       *!! अमृतादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग : -* अमृतादि गुग्गुल , वातरक्त, कोढ़, कुष्ठ, अर्श, मन्दाग्नि, दुष्टव्रण, प्रमेह, आमवात, भगन्दर, नाड़ीव्रण, आढ्यवात, सूजन आदि रोगों में उत्तम लाभ करता है ! यह रक्तशोधक, वात एवं बद्धकोष्ठ नाशक है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ४ गोली, दिन में दो बार गर्म पानी के साथ या रोगानुसार अनुपान के साथ !!

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आयुर्वेदिक गुग्गुल भाग १ !

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक गुग्गुल भाग १ !!* 🌺🙏🏻🌺

        *!! हरीतक्यादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग: -* हरीतक्यादि गुग्गुल - दीपन- पाचन और मृदुचिरेचक है ! यह आमवात, वातव्याधि, पीठ, कमर, जांघ आदि में दर्द, बद्धकोष्ठता आदि में लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार गर्म पानी या दूध के साथ !!

         *!! सप्ताविंशति गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-*  सप्ताविंशति गुग्गुल भगन्दर, बवासीर, नासूर, नाड़ीव्रण, दुष्टाव्रण, हृदय एवं पसली के दर्द, कुक्षि, वस्ति (पेडू), गुदामार्ग, मूत्रनली के विकार, अन्त्र-वृद्धि, श्लीपद, शोथ, कृमि, कुष्ठादि चर्म रोगों में उत्तम लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार शहद के साथ !!

            *!! सिंहनाद गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-*  सिंहनाद गुग्गुल वात-रक्त, गुल्म, शूल, उदर, कुष्ठ व कठिन से कठिन आमवात, पक्षाघात, संधिवात आदि रोगों में लाभ प्रदान करता है ! आमवात की यह श्रेष्ठ दवा है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार पानी या दूध के साथ !!

       *!! महायोगराज गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* महा योगराज गुग्गुुल यह रसायन दीपन, पाचन, आमदोषनाशक, वातघ्न व धातु-परिपोषक है ! यह सभी प्रकार के वातव्याधि, वातरक्त, उदावर्त, मेदोवृद्धि, हृदय का जकड़ना, संधिवात, मन्दाग्नि, श्वास, खाँसी, पुरूषों के वीर्यदोष व स्त्रियों के रजोदाष एवं शोथ, आमवात, अपस्मार, पक्षवात, कामला, कुष्ठ, नेत्ररोग आदि के लिए अत्यन्त लाभकारी है ! असाध्य वात रोगों में भी इसका सफल प्रयोग होता है ! वैद्यगण जोड़ों व हड्डियों के दर्द आदि मे इसका उपयोग कर रोगी को लाभ प्रदान करते हैं ! इसका उपयोग समस्त वात विकारों में रास्नादि कवाथ से, वारक्त में गिलोय के क्वाथ से, मेदोवृद्धि में शहद से, पांडुरोग में गो-मूत्र से, कुष्ठ रोग में नीम की छाल के क्वाथ, शोथ व शूल में पीपल के क्वाथ, नेत्र रोग में त्रिफला क्वाथ, उदर रोगों में पुनर्नवा के क्वाथ के साथ देना चाहिए ! शरीर में रक्त की कमी के कारण रक्तवाहिनियों में वायु प्रवेश करके व वात वाहिनियों में विक्षोभ उत्पन्न हो कर हाथ -पैरों में ऐंठन, बांइटे, कम्प, आदि ! ऐसी स्थिती में इस औषधी को कासीस भस्म १२५ मिलीग्राम के साथ अंगूर के रस व शहद मे मिलाकर देने से विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार रोगानुसा अनुपान के साथ !!

       *!! लाक्षादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-*  लाक्षादि गुग्गुल अस्थि के विकारों के लिए एक उत्तम औषधी है ! शरीर के किसी हड्डी में चोट लग गयी हो या दर्द होता हो या हड्डी टूट गयी हो, उसमें लाक्षादि गुग्गुल बहुत लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार शहद के साथ !!

      *!! रास्नादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* रास्नादि गुग्गुल आमवात, गठिया, संधिवात, गृध्रसी, कर्णरोग, शिरोरोग, नाड़ व्रण, नासूर व भगन्दर में लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार दशमूल या रास्नादि क्वाथ या गर्म पानी के साथ !!

       *!! योगराज गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग -* योगराज गुग्गुल आमवात, गठिया, वातरक्त, भगन्दर, अरूचि, स्त्री-पुरूष के जननेन्द्रिय विकार, स्त्रियों के प्रसव संबंधि विकार, कास-श्वास, धातुक्षीणता, पेट की गैस, कोष्ठबद्धता, बहुमूत्र, प्रमेह, अर्श व शिरोरोग आदि में विशेष लाभदायक है ! इसका उपयोग वात रोगों में विशेष रूप से किया जाता है ! यह वातहर, शोधक, सारक, रोचक व कृमिनाशक और पौष्टिक गुण वाला है !!

*मात्रा व अनुसान : -* २ से ३ गोली, दिन में दो बार वात-विकारों में दशमूल क्वाथ के साथ, बलवृद्धि एवं शरीर पुष्टि के लिए गाय के दूध के साथ !!

        *!! पंचतिक्त घृत गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* पंचतिक्त घृत गुग्गुल रक्तशोधक व रक्तवर्द्धक है ! यह विष दोष, ऊध्र्वजत्रुगत रोग, गुल्म, अर्श, प्रमेह, वातरोग, कुष्ठ, अरूचि, श्वास, पीनस, कास, शोध, हृदय रोग, पांडु रोग, नाड़व्रण, अर्बुद, भगन्दर, गण्डमाला, यक्ष्मा, विद्रधि व वातरक्त, अस्थि- क्षय, उपदंश, घाव, फोड़ा-फुंसी, चकत्ता, अपरस आदि रोगों में ऊत्तम लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* ६ से १० ग्राम, १२५ ग्राम दूध के साथ !!

       *!! पंचामृत लौह गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* पंचामृत लौह गुग्गुल स्नायु- दुर्बलता, मस्तिष्क की कमजोरी, कमर व घुटने का दर्द, गृध्रसी, अपबाहुक, स्नायुओं में होने वाले वात विकार, अनिद्रा, मन्दाग्नि, पांडु रोग, उदरवात आदि रोगों में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार दूध के साथ या रोगानुसार अनुपान के साथ !!

        *!! पुनर्नवादि गुग्गुल !!*

*गुण व उपयोग :-* पुनर्नवादि गुग्गुल वात रक्त, वृद्धि रोग, गृध्रसी, जंघा, बस्ति प्रदेश में होने वाले दर्द, भंयकर आमवात, शोथ, जलोदर आदि रोगों में लाभ प्रदान करता है ! इसका उपयोग सूजन आदि में विशेष रूप से किया जाता है !!

*मात्रा व अनुसान : -* १ से २ गोली, दिन में दो बार पुनर्नवादि क्वाथ या गर्म पानी साथ !!

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! बंद हुआ मासिक धर्म फिर से जारी करें !!*

🌺🙏🏻🌺 *!! बंद हुआ मासिक धर्म फिर से जारी करें !!* 🌺🙏🏻🌺

स्त्रियों का फूल जवानी में ही समाप्त हो गया हो या रजोधर्म बंद हो गया हो उन स्त्रियों को चाहिए कि ! इंद्रायण की जड़ को सिल पर पानी के साथ पीसकर छोटी उंगली के समान बत्ती बनाकर इस बत्ती को योनि में रखने से या गर्भाशय के मुख पर कई दिन रखने से खुलकर रजोधर्म जारी हो जाता है !!
           *!! परिक्षित योग है !!*

*नोट :-* इस योग से विधवाओं का रहा हुआ गर्भ भी गिर जाता है ! इसके लिए यह नुस्खा परमोत्तम है ! वैद्यजीवन में लिखा है....
*"मूलगवाछ्या स्मरमन्दिरस्थ पुष्पावरोधस्य बध करोति" !*
*"अभर्तृकाना व्यभिचारिर्णाना योगो यमेव द्रत गर्भपाते" !!*

*नोट :-* इंद्रायण दो तरह की होती है ! एक बडी और एक छोटी ! यह ज्यादातर खारी जमीन या कैरों जमीन में उगती है ! इसके पत्ते लम्बे लम्बे और बीच में कटे होते हैं ! और फूल पीले रंग के पांच पंखुड़ी में होते हैं ! इसके फल छोटे छोटे कांटेदार लाल नारंगी के जैसे होते हैं ! इसके बीच में बीज बहुत होते हैं !!
दूसरी इंद्रायण रेतीली जमीन में होती है ! फल पीले रंग का व फूल सफेद होता है ! दवा के काम मे इसके फल का गूदा लिया जाता है ! इसकी मात्रा छ: रत्ती से दो मासे तक ली जाती है !

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आयुर्वेदिक पाक/ अवलेह भाग २

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक पाक/ अवलेह भाग २ !!* 🌺🙏🏻🌺

         *!! च्यवनप्राशावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* च्यवनप्राशावलेह शरीर को बल व स्फूर्ति प्रदान करने वाला है ! यह बल, वीर्य, कान्ति व बुद्धि को बढ़ाता है ! यह वीर्य विकार, स्वप्नदोष, राजयक्ष्मा, खाँसी, श्वास, प्यास, वातरक्त, छाती का जकड़ना, वातरोग, पित्तरोग, शुक्रदोष व मूत्रदोष में उत्तम लाभ देता है ! यह फेफड़े मजबूत करता है, दिल को ताकत देता है, पुरानी खाँसी व दमा में लाभ करता है ! इसके सेवन से शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है ! यह वृद्धि व स्मरण-शक्तिवर्द्धक एवं मैथुन में आनन्द देने वाला है ! रोग के पश्चात् की दुर्बलता दूर करता है ! इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन ‘सी’ होता है ! स्त्रियों के गर्भाशय व पुरूषों के वीर्य- दोष को मिटा कर उनको सन्तान सुख देने योग्य बनाता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

         *!! चोपचीनी पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* चोपचीनी उपदंश, व्रण, कुष्ठ, वातव्याधि, भगन्दर, धातुक्षय से उत्पन्न खाँसी, जुकाम, सूजाक व उपदंश के कारण पेदा हुर्इ रस -ग्रन्थियों की सूजन, पुराना नजला, लकवा, हाथ- पैरों में सूजन व यक्ष्मा आदि में उत्तम होता है ! यह काम शक्तिवर्द्धक, बाजीकरण करने वाला व शरीर को पुष्ट करने वाला है ! यह रक्तशोधक है व खून को साफ कर फोड़े-फुंसियों का नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १-१ लड्डू, दिन में दो बार !!

         *!! चित्रक हरीतकी !!*

*गुण व उपयोग : -* चित्रक हरीतकी पुराने श्वास, जुकाम, खाँसी, पीनस, कृमि रोग, गुल्म, उदावर्त, अर्श, मन्दाग्नि में श्रेष्ठ लाभ करती है ! इसके सेवन काल में नाक में दो बार षड़बिन्दु तेल डालने से विशेष लाभ मिलता है ! पुराने या बिगड़े हुए जुकाम में यह बहुत ही लाभकारी है ! इसके सेवन करते समय, इसमें अभ्रक भस्म १०० मिलीग्राम मिला ली जाए तो इसके गुण और भी बढ़ जाते हैं !!

*मात्रा व अनुपान : -* ५ से ७ ग्राम, दिन में दो बार गाय के गर्म दूध के साथ !!

           *!! चन्दनादि अवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* चन्दनादि अवलेह हृदय रोग, भ्रम, ‌‌मूर्च्छा, वमन व भंयकर का नाश करता है ! अम्लपित्त में इसे प्रवाल के भस्म चन्द्रपुटी २५० मिलीग्राम के साथ सेवन करने से विशेष लाभ मिलता है ! इससे पाचन शक्ति बढ़ती है व भूख खुलकर लगती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार पानी या दूध के साथ !!

          *!! गोखरू पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* गोखरू पाक अर्श, प्रमेह, क्षय, मूत्रपिंड की सूजन, शरीर की दुर्बलता, बस्तिशोथ, शुक्रजनित व बलवर्द्धक है ! यह काम-शक्ति बढ़ाता है ! व गर्भाशय को शक्ति देता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम तक दूध या ठण्डे पानी के साथ !!

             *!! गुलकन्द !!*

*गुण व उपयोग : -* गुलकन्द दाह, पित्तदोष, जलन, गर्भाशय की गर्मी, आन्तरिक गर्मी बढ़ना, मासिक धर्म में अधिक रक्त आना, हाथ- पैरों में जलन व कब्ज आदि रोगों में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम !!

        *!! खमीरे गावजवान !!*

*गुण व उपयोग : -* खमीरे गावजवान भूख बढ़ाने वाला, उदर शुद्धि करने वाला, दृष्टि में लाभदायक व दिल एवं दिमाग को पुष्ट बनाने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान :-* १० ग्राम चाँदी का वर्क मिलाकर १२० ग्राम गावजवान अर्क या ताजे पानी के साथ !!

         *!! गुलकन्द - प्रवालमिश्रित !!*

*गुण व उपयोग : -* प्रवालमिश्रित गुलकन्द सामान्य गुलकन्द से अधिक गुणकारी होता है ! यह दाह, पित्तदोष, जलन, गर्भाशय की गर्मी, आन्तरिक गर्मी बढ़ना, मासिक धर्म में अधिक रक्त आना, हाथ- पैरों में जलन व कब्ज आदि रोगों में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, पानी या दूध के साथ !!

          *!! कुष्माण्ड (खण्ड) अवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* कुष्माण्ड खण्ड शीतप्रधान है ! यह रक्त-पित्त, क्षय, खाँसी, श्वास, छर्दि, अधिक प्यास लगना, ज्वर, रक्तपित्त आदि में उत्तम लाभ करता है ! यह बलवर्द्धक, वर्णशोधक, उर:संधान कारक, वृंहण, स्वर को तीव्र करने वाला, अतिऊत्तम रसायन है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दूध के साथ !!

         *!! कुटजावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* कुटजावलेह अतिसार, दु:साध्य संग्रहणी व प्रवाहिका (पेचिश), मरोड़ के दस्तों, दस्तों के साथ खून आना, बवासीर, रक्तपित्त, प्रमेह, कामला, पुरानी आँव आदि में रोगों में उत्तम लाभ करता है ! रक्तातिसार में इसका विशेष उपयोग किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ४ से ६ ग्राम, दिन में दो बार शहद के साथ !!

           *!! कासकण्डनावलेह !!*

*गुण व उपयोग :-* कासकण्डनावलेह पुरानी खाँसी, मन्द ज्वर, मन्दाग्नि, रक्त की कमी, कफ का जमना, छाती में दर्द आदि मेंउत्तम लाभ करता है ! इसके सेवन से छाती में जमा हुआ कफ बाहर निकलता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २ से ४ गाम, दिन में दो बार शहद या गर्म पानी के साथ !!

          *!! कामेश्वर मोदक !!*

*गुण व उपयोग : -* कामेश्वर मोदक बाजीकरण व कामाग्नि संदीपन है ! यह निर्बल पुरूषों को बल देता है ! व उर:क्षत, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, अतिसार, अर्श, ग्रहणी, प्रमेह व श्लेष्मप्रकोप आदि व्यादियों को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान :-* १ से ३ ग्राम, गो-दुग्ध के साथ, प्रात: काल !!

        *!! कल्याणावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* कल्याणावलेह याददाश्त बढ़ाने वाला व स्वर को कोकिल के समान बनाने वाला है ! इसका सेवन कुछ दिन तक लगातार करने से याददाश्त बढ़ती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार गोघृत के साथ !!

          *!! कंटकार्यवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* कंटकार्यवलेह श्वास, कास, हिचकी, कफ का छाती में जमना, सूखी व गीली खाँसी आदि में लाभ प्रदान करता है ! भीतर जमे हुए कफ को बाहर निकलता है ! ज्वर में भी यह लाभकारी है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार उचित अनुपान के साथ !!

          *!! एरण्ड पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* अरणड पाक लकवा, पंगुलवात, आमवात, ऊरूस्तम्भ, शिरागत वायु, कटिवात, बस्तिवात, कोष्ठगत वात, वृषणवृद्धि, सूजन, उदर शूल, अपेण्डीसाइटिस आदि रोगों में लाभदायक है ! इसके सेवन से कमजोरी दूर हो कर बलवृद्धि होती है ! स्त्रियों में दूध की मात्रा को बढ़ाता है ! इसके सेवन से पाचन शक्ति में वृद्धि होती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, गर्म दूध या पानी के साथ !!

          *!! आर्द्रक पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* ‌‌‌आर्द्रक पाक अरूचि, स्मरण- शक्ति कम कमी, सूजन, ग्रहणी, दर्द, उदर रोग, श्वास, कास, स्वरभंग, गुल्म आदि रोगों में लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार !!

          *!! आरग्वद्यावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* आरग्वद्यावलेह औषधीउत्तम अग्निप्रदीपक, वातनुलोमक व मृदुसारक है ! यह अजीर्ण, के कारण कब्जियत आदि में लाभदायक है ! इसके सेवन से पेट साफ होता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दोष, काल, बल व अवस्थानुसार गर्म पानी के साथ !!

           *!! आम्रपाक !!*

*गुण व उपयोग : -* आम्रपाक क्षय, संगहणी, श्वास, रक्तपित्त, वीर्यविकार, ग्रहणी, अम्लपित्त, अरूचि, रक्तपित्त, पांडु रोग, कब्ज, संग्रहणर, शुक्र-विकार आदि रोगों में यह विशेष लाभ करता है ! यह अत्यन्त बाजीकरण, पौष्टिक, बलदायक है ! अल्पशुक्र वाले व्यक्तियों को इसके सेवन से शुक्र की वृद्धि हो कर काम शक्ति जागृत होती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १ से २ ग्राम, भोजन से पहले, गो-दुग्ध या पानी के साथ !!

          *!! आमलक्याद्यवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* आमलक्याद्यवलेह पांडु, कामला, रक्तपित्त, पित्तविकार, अम्लपित्त, अन्र्तदाह, बाह्यदाह, प्यास की अधिकता, हृदय की धड़कन बढ़ना आदि में विशेष लाभ देता है ! इसका उपयोग पांडु रोग में विशेष रूप से किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ६ से १० ग्राम, गोमूत्र या छाछ के साथ !!

         *!! आँवला मुरब्बा !!*

*गुण व उपयोग : -* आँवले का मुरब्बा दाह, सिर दर्द, पित्तकोप,, चक्कत, नेत्र जलन, बद्धकोष्ठ, अर्श, रक्तविकार, त्वचा दोष, प्रमेह व वीर्य के विकारों में लाभ कर शरीर को बलवान बनाता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १ से २ आँवले !!

         *!! अश्वगन्धा पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* अश्वगन्धा पाक पौष्टिक, बलवर्द्धक व अग्निप्रदीक है ! यह प्रमेह, धातु की दुर्बलता, स्वप्नदोष, पेशाब के साथ धातु आना, वात-विकार, वात के कारण दर्द आदि रोगों में विशेष लाभ करता है ! इसका असर वृक्क, शुक्राशय एवं वातवाहिनी नाड़ी पर विशेष होता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० ग्राम, दिन में दो बार शहद, गो-दुग्ध या पानी के साथ !!

          *!! अव्टांगावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* अव्टांगावलेह विशेष रूप से खाँसी, श्वास, कफ ज्वर, न्यूमोनिया में कफ का न आना आदि में लाभदायक है ! इसके सेवन से जमा हुआ कफ पिघल कर बाहर आता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १ से २ ग्राम, दिन में दो बार !!

         *!! अम्लपित्तहर पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* अम्लपित्तहर पाक में अभ्रकभस्म व लौहभस्म का सम्मिश्रण होने से यह अम्लपित्त में विशेष लाभ देता है ! यह अम्लपित्त, अरूचि, शूल, हृदय रोग, वमन, कण्ठदाह, हृदय की जलन, सिर दर्द आदि रोगों में लाभदायक है ! यह बलवर्द्धक व पौष्टिक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० ग्राम, दिन में दो बार गर्म दूध या पानी के साथ !!

        *!! अमृतभल्लातक !!*

*गुण व उपयोग : -* अमृत भल्लातक कफ, वातरोगों, जीर्ण प्रतिष्याय, पक्षाघात, कमर दर्द आदि में लाभदायक है ! यह वीर्यवर्द्धक व बाजीकरण है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० ग्राम, दिन में दो बार !!

         *!! अमृतप्राशावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* अमृतप्राशावलेह खाँसी, दमा, तृषा, रक्तपित्त व शुक्रक्षय में अच्छा लाभ प्रदान करता है ! कमजोरी से मुक्ति दिलाता है ! यह उत्तम पौष्टिक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ५ से १० ग्राम, बकरी के दूध के साथ !!

        *!! अभयादि मोदक !!*

*गुण व उपयोग : -* अभयादि मोदक कब्जियत, मन्दाग्नि, विषज्वर, उदर रोग, पांडु व वातरोग आदि में लाभदायक है ! यह विरेचक है !!

*मात्रा व अनुपान: -* १ से २ गोली, दिन में दो बार ठण्डे पानी के साथ !!

        *!! अगस्त्य हरीतकी !!*

*गुण व उपयोग : -* अगस्त्य हरीतकी दमा, क्षय, खाँसी, ज्वर, अर्श, अरूचि, पीनस, ग्रहणी, बदहजमी, अपचन, हृदय व रक्तवाहिनी सिराओं की शिथिलता, संग्रहणी, अतिसार आदि रोगों में लाभदायक है ! इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है ! यह मृदु विरेचक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* वैद्य की सलाहनुसार !!

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नाखून सड़ना ,पेरोनिसिया ,हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना.

  पेरोनिसिया  हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना. आयुर्वेदिक  मुलेठी 50ग्राम बडी सोफ 50 ग्राम  अच्छी हळदी 50 ग्राम  नीम पत्ते चुर्ण 50 ग्राम  ...