शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

आयुर्वेदिक पाक/ अवलेह भाग १

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक पाक/ अवलेह भाग १ !!* 🌺🙏🏻🌺

           *!! हरिद्रा खण्ड !!*

*गुण व उपयोग : -* हरिद्रा खण्ड शीतपित्त, उदर्द, चकते, कण्डु, खुजली, ‌‌‌एग्जिमा-छाजन, जीर्णज्वर, कृमि, पांडुरोग, शाथ आदि रोगों में उत्तम लाभ करता है ! यह मृदु विरेचक भी है !!

*मात्रा व अनुपान : -*
६ से १० ग्राम, पानी के साथ !!

          *!! हरीतकी खण्ड !!*

*गुण व उपयोग : -* हरीतकी खण्ड अम्लपित्तजन्य दर्द व अम्लपित्त, अर्श, काष्ठगत विकार, वातरोग, कटिशूल में उत्तम लाभ करता है ! यह उत्तम विरेचक भी है !!

*मात्रा व अनुपान : -*
    ६ से १० ग्राम, बलानुसार गर्म दूध या पानी के साथ !!

          *!! सौभग्य शुण्ठीपाक !!*

*गुण व उपयोग : -* सौभग्य शुण्ठीपाक बल एवं आयु की वृद्धि करता है ! पुरूषों के लिए भी बल-वर्द्धक है ! स्त्रियों के लिए अमृत-तुल्य लाभकारी है ! इसके सेवन से योनिविकार, प्रदर, कष्टार्तव आदि रोग नष्ट होते हैं ! प्रसूता स्त्रियों के लिए विशेष लाभप्रद है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से २० ग्राम, दिन में दो बार !!

           *!! सुपारी पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* सुपारी पाक के सेवन से स्त्रियों की योनि से होने वाले विभिन्न प्रकार के स्राव (प्रदर) नष्ट होते हैं ! बन्ध्यत्व दोष को नष्ट करके उन्हे सन्तानोपत्ति योग्य बना देता है ! पुरूषों के शीघ्रपतन व शुक्रपतन एवं शुक्रमेह रोग में अत्यन्त गुणकारी है ! गर्भाशय को शक्ति देता है व योनि को संकुचित करता है !!
       विशेषतय: प्रसूता स्त्रियों के लिए अतिशय गुणकारी है ! इसके सेवन से प्रौढ़ा स्त्री भी कान्तियुक्त हो जाती है ! प्रदर रोग के कारण होने वाले कमर दर्द, सिर दर्द रहना, कमजोरी आदि में उत्तम लाभ करता है ! स्त्रियों में अमृततुल्य लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, सुबह-शाम, गाय के दूध के साथ !!

         *!! व्याघ्री हरीतकी !!*

*गुण व उपयोग : -* व्याघ्री हरीतकी खाँसी, श्वास रोग, बद्धकोष्ठ, गले की खराबी आदि में उत्तम लाभकारी है ! कफ व वात प्रधान रोगों में इससे विशेष लाभ होता है ! कास व श्वास रोगी के लिए यह अमृत के समान लाभ प्रदान करता है !!
*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दिन में दो बार, पानी या दूध के साथ !!

         *!! वासाहरीतकी अवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* वासाहरीतकी अवलेह खाँसी, क्षय, श्वास, रक्तपित्त, प्रतिश्याय, रक्तस्राव, रक्त मिश्रित दस्त, बवासीर, रक्तप्रदर, हृदय की कमजोरी, कब्ज आदि में लाभदायक है ! यह विशेष रूप से श्वास नलिका, खाँसी, कफ रोग आदि में लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम अवलेह चटाकर ऊपर से गाय का गर्म दूध पीना चाहिए !!

            *!! वासावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* वासावलेह के सेवन से खाँसी, श्वास, रक्तप्रदर, रक्तपित्त, खूनी बवासीर, रक्तमिश्रित दस्त, पुरानी कफज खाँसी, श्वास-नलिका की सूजन, न्यूमोनिया, प्लूरिसी, इन्फ्लुएन्जा के बाद की खाँसी आदि में लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दिन में दो बार शहद या रोगानुसार अनुपान के साथ !!

        *!! लऊक सपिस्ताँ !!*

*गुण व उपयोग : -* लऊक सपिस्ताँ के सेवन से कठिन से कठिन नजला, जुकाम आदि रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ! कास-श्वास रोग में भी उत्तम ‌‌‌लाभकारी है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, ‌‌‌प्रात: शाम चाटकर ऊपर से सुखोष्ण पानी पी लें !!

          *!! मूसली पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* मूसली पाक अत्यन्त पौष्टिक, बल-वीर्य व कामशक्ति-वर्द्धक और नंपुसकता- नाशक है ! इसके सेवन से धातु- दौर्बल्य नष्ट होकर शरीर स्वस्थ, कान्तियुक्त व बलशाली बनता है ! स्त्रियों के प्रदर रोग व पुरूषों के वीर्य दोष को नष्ट करने में यह अतिउत्तम है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दूध या पानी के साथ !!

        *!! माजनू फलासफा !!*

*गुण व उपयोग : -* माजनू फलासफा दिल, दिमाग, वातनाड़ियों व स्नायु मण्डल की कमजोरी में उत्तम लाभ प्रदान करता है ! इसके सेवन से वातरोगों में विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ५ से ६ ग्राम !!

           *!! मदनानन्द मोदक !!*

*गुण व उपयोग : -* मदनानन्द मोदक के उपयोग से बल- वीर्य की वृद्धि, रति- शक्ति की वृद्धि व स्तम्भन शक्ति प्राप्त होती है ! यह अपस्मार, ज्वर, उन्माद क्षय, वातव्याधि, कासव्याधि, कासश्वास, शोथ, भगन्दर, अर्श, ग्रहणी, बहुमूत्र, प्रमेह, शिरोरोग, अरूचि व वातिक- पैतिज और कफज रोग आदि में लाभ प्रदान करता है ! यह संग्रहणी व मन्दाग्नि की उत्तम दवा है ! इसका सेवन वैद्य की देखेरख में ही करना चाहिए !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, दूध या पानी के साथ !!

             *!! भार्गी गुड़ !!*

*गुण व उपयोग : -* भार्गी गुड़ पुराने कास- श्वास वाले रोगी के लिए अमृत के समान लाभ करता है, क्योंकि इसका प्रभाव वातवाहिनी व कफवाहिनी नाड़ियों पर विशेष होता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार !!

        *!! ब्राह्मी रसायन !!*

*गुण व उपयोग : -* ब्राह्मी रसायन खाँसी, दमा, क्षय, कब्जियत आदि में लाभ करती है ! इसके सेवन से शरीर व दिमाग की कमजोरी दूर हो कर आयु, बल, कान्ति व स्मरण शक्ति की वृद्धि होती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० ग्राम, गाय के दूध या पानी के साथ !!

         *!! नारिकेल खण्ड पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* नारिकेल खझउ पाक के सेवन से पुरूषत्व निद्रा व बल की वद्धि होती है ! और यह अम्लपित्त, परिणामशूल, शुक्र-क्षयादि, अपचन, उदरशूल, खट्टी डकारें व क्षय आदि रोगों मे विशेष लाभकारी है ! इसके सेवन से पौरूष की बढ़ोत्तरी हो कर शरीर को बल मिलता है ! यह शीतवीर्य, स्निग्ध व पौष्टिक है ! अम्लपित्त रोग में यह विशेष लाभकारी है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दिन में दो बार दूध या पानी के साथ !!

          *!! बाहुशाल गुड़ !!*

*गुण व उपयोग : -* बाहुशाल गुड़ के सेवन से बवासीर, गुल्म, पीनस, पांडु, हलीमक, उदर रोग, मन्दाग्नि, ग्रहणी, क्षय, आमवात, संग्रहणी, प्रमेह प्रतिश्याय आदि रोगों में उत्तम लाभ मिलता है ! यह बल, मेधा व कान्तिवर्द्धक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १०- १० ग्राम, दिन में दो बार, दूध या पानी के साथ !!

          *!! बादाम पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* बादाम पाक बल, वीर्य व औज की वृद्धि करता है ! यह रस- रक्तादि धातुओं को बढ़ाकर शरीर को कान्तियुक्त बना देता है ! ध्वजभंग, नंपुसकता, स्नायु दौर्बल्य में बहुत लाभदायक है ! मस्तिष्क, हृदय की कमजोरी व शुक्र- क्षय, पित्त-विकार, नेत्र और शिरोरोग में लाभकारी है ! इसके सेवन से शरीर पुष्ट होता है ! यह सर्दियों में सेवन करने योग्य उत्तम पुष्टर्इ है ! दिमागी काम करने वाले व सिर दर्द वाले को इस पाक का सेवन अवश्य करना चाहिए !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, गाय के दूध या पानी के साथ !!

         *!! धात्री रसायन !!*

*गुण व उपयोग : -* धात्री रसायन कास, श्वास, क्षय, दुर्बलता, फेफड़ों की दुर्बलता, खाँसी, स्नायविक दुर्बलता आदि में उत्तम लाभ करता है ! यह पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक रसायन व उत्तम बाजीकरण है ! यह आमाशय, मस्तिष्क, हृदय व आँतों को बलवान बनाता है ! एवं जठराग्नि को प्रदीप्त करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ४ से ६ ग्राम, सुबह भोजन से ३ घण्टा पूर्व गाय के दूध के साथ, रात्रि को सोने से आधा घण्टा पहले !!

          *!! दाड़िमावलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* दाड़िमावलेह पित्त, क्षय, रक्तपित्त, प्यास, अतिसार, संगहणी, दुर्बलता, नेत्ररोग, शिरोरोग, दाह, अम्लपित्त, धातुस्राव, अरूचि आदि रोगों में लाभदायक है ! इसके सेवन से हृदय व मस्तिष्क को ताकत मिलती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दिन में दो से तीन बार !!

            *!! जीवन कल्प !!*

*गुण व उपयोग : -* जीवन कल्प के सेवन से रक्ताल्पता, आल्स्य, कामला, श्वास, कास, शारीरिक क्षीणता आदि विकार नष्ट हो कर शरीर हृष्ट-पुष्ट व बलवान बनता है ! शीतकाल में इसका सेवन विशेष लाभकारी होता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, आवश्यकतानुसार दूध के साथ !!

          *!! जीरकादि अवलेह !!*

*गुण व उपयोग : -* जीरकादि अवलेह प्रमेह, प्रदर, ज्वर, दुर्बलता, मन्द-मन्द ज्वरांश बना रहना, भूख कम या बिल्कुल न लगना, अरूचि, श्वास, तृषा, दाह व यक्ष्मा आदि रोगों में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० ग्राम, दिन में दो बार ठण्डे पानी या दूध के साथ !!

          *!! छुहारा पाक !!*

*गुण व उपयोग : -* छुहारा पाक शरीर को बल देने वाला है ! इसके सेवन से रति शक्ति में वृद्धि होती है ! व स्वप्नदोषादि रोग नष्ट होते हैं ! इससे शुक्रक्षीणता के कारण पुरूष की व रजोदोष के कारण स्त्री की कमजोरी दूर होती है !!

*मात्रा व अनुपान : -* १० से २० ग्राम, दूध या पानी के साथ !!

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शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

गन्धक तेल

🌹✍🏻    गंधक तेल     ✍🏻🌹

जासु कृपा कर मिटत सब आधि,व्याधि अपार

तिह प्रभु दीन दयाल को बंदहु बारम्बार

🌳🌺महिला संजीवनी 🌺🌳

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गंधक का तेल बनाने के लिए 1 गज भर कपड़ा लेकर के उसको थूहर के दूध से भिगो के सुखा दें फिर आप के दूध से सुखा दें उन्हें इसी प्रकार से करें ऐसा 7 बार करें फिर गंधक को घी में मिलाकर के कपड़े पर मोटा लेप करते हैं और इस कपड़े को एक  बत्ती की तरह बना ले रोल करके और एक खूंटी पर टांग दें और उसमें आग जला दें आग नीचे से लगानी है नीचे एक बर्तन रख दें बर्तन में निचे तेल जमा हो जाएगा ।

गुण - इस तेल से दाद, खाज ,खुजली , में शर्तिया फायदा होता है प्रयोग करे और फायदा ले और दुसरो को भी दे

note- पथरी की दवा के लिए संपर्क करे चाहे कही भी पथरी हो शर्तिया ठीक करने होती है

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🌳🕉🌺महिला संजीवनी 🌺🕉🌳
गुरुवेंद्र सिंह शाक्य
जिला -एटा , उत्तर प्रदेश
9466623519
🌳🕉🌺संजीवनी परिवार 🌺🕉🌳
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आयुर्वेदिक क्षार !

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक क्षार !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! मूली क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* यह क्षार पाण्डु, कामला, शोथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ, मूत्रशर्करा, पेशाब की जलन आ​दि में उत्तम गुणकारी है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक, ठण्डे पानी, नारीयल पानी, वरूणा​दि क्वाथ, गोखरू क्वाथ आ​दि के साथ !!

         *!! अपामार्ग क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* अपामार्ग क्षार तीक्ष्ण श्वास, कास, गुल्म, शूल आ​दि रोग नाशक है ! मधु के साथ लेने से अथवा द्राक्षासव, पिप्पल्यासव अथवा कनकासव के साथ लेने से श्वास और कास रोग में शीघ्र लाभ होता है ! गोमूत्र में मिलाकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक दिन में २ - ३ बार मधु, गुलबनफ्सा शर्बत, मुलेठी शर्बत, द्राक्षासव, पिप्पल्यासव या कनकासव के साथ !!

        *!! इमली क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* इमली क्षार अग्निमान्द्य, गुल्म, शूल, मूत्रकृच्छ और अश्मरी रोग को नष्ट करता है ! स्नुही क्षार और अर्कक्षार तथा शंख भस्म के साथ मिलाकर देने से विसूचिका रोग को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक, गर्म पानी, शंख भस्म, त्रिकुट चूर्ण आ​दि के साथ !!

        *!! कण्टकारी क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* खाँसी, वास, गले की खराबी, प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम), मूत्रकृच्छ आ​दि रोगों को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २५० मिलीग्राम से २ ग्राम तक, मधु, गुलबनफ्सा आ​दि या श्रृंग्या​दि क्वाथ, शर्बत गुलबनफ्सा, शर्बत अडूसा, शर्बत मुलेठी आ​दि में मिलाकर !!

      *!! टंकण क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* यह उष्णवीर्य, रूक्ष, तीक्ष्ण, साकर, कफ नि:सारक, हृद्य, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, आर्तवजनक, बल्य पित्तकारक, मूढ़ गर्भ प्रवर्तक तथा वात रोगों, कास, श्वास, विष, आध्मान और नाना प्रकार के व्रणों का नाशक है !!

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गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

आयुर्वेदिक क्षार !

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक क्षार !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! मूली क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* यह क्षार पाण्डु, कामला, शोथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ, मूत्रशर्करा, पेशाब की जलन आ​दि में उत्तम गुणकारी है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक, ठण्डे पानी, नारीयल पानी, वरूणा​दि क्वाथ, गोखरू क्वाथ आ​दि के साथ !!

         *!! अपामार्ग क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* अपामार्ग क्षार तीक्ष्ण श्वास, कास, गुल्म, शूल आ​दि रोग नाशक है ! मधु के साथ लेने से अथवा द्राक्षासव, पिप्पल्यासव अथवा कनकासव के साथ लेने से श्वास और कास रोग में शीघ्र लाभ होता है ! गोमूत्र में मिलाकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक दिन में २ - ३ बार मधु, गुलबनफ्सा शर्बत, मुलेठी शर्बत, द्राक्षासव, पिप्पल्यासव या कनकासव के साथ !!

        *!! इमली क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* इमली क्षार अग्निमान्द्य, गुल्म, शूल, मूत्रकृच्छ और अश्मरी रोग को नष्ट करता है ! स्नुही क्षार और अर्कक्षार तथा शंख भस्म के साथ मिलाकर देने से विसूचिका रोग को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -*  २५० मिलीग्राम से १ ग्राम तक, गर्म पानी, शंख भस्म, त्रिकुट चूर्ण आ​दि के साथ !!

        *!! कण्टकारी क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* खाँसी, वास, गले की खराबी, प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम), मूत्रकृच्छ आ​दि रोगों को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २५० मिलीग्राम से २ ग्राम तक, मधु, गुलबनफ्सा आ​दि या श्रृंग्या​दि क्वाथ, शर्बत गुलबनफ्सा, शर्बत अडूसा, शर्बत मुलेठी आ​दि में मिलाकर !!

      *!! टंकण क्षार !!*

*गुण व उपयोग : -* यह उष्णवीर्य, रूक्ष, तीक्ष्ण, साकर, कफ नि:सारक, हृद्य, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला, आर्तवजनक, बल्य पित्तकारक, मूढ़ गर्भ प्रवर्तक तथा वात रोगों, कास, श्वास, विष, आध्मान और नाना प्रकार के व्रणों का नाशक है !!

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आयुर्वेदिक घृत

🌺🙏🏻🌺 *!!  !!* 🌺🙏🏻🌺

         *!! त्रिफला घृत !!*

*गुण व उपयोग :-* त्रिफला घृत के सेवन से आंख की ज्योति बढ़ती है ! तथा रतौंधी, आंखों से पानी बहना, खुजली पड़ना, रक्त दृष्टि, नेत्र पीड़ा और नेत्र विकार दूर होते हैं ! त्रिफला के पूर्ण गुण होने के साथ-साथ स्निग्धता भी आती है ! और पेट साफ रहता है !!

*मात्रा व अनुपान :-* ५ से १० ग्राम प्रातः-सायं दूध के साथ !!

        *!! शतावरी घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह पौष्टिक, शीतवीर्य एवं बाजीकरण है ! इसके सेवन से रक्तपित्त, वातरक्त, शुक्र रोग, शरीर की जलन, पित्तज्वर, योनिशूल, मूत्रकृच्छ आदि रोगों में शीघ्र लाभ मिलता है ! यह शरीर को बल प्रदान करने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, मिश्री के साथ चटाकर ऊपर से गौ-दुग्ध पिलाएं !!

      *!! महातिक्त घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से कुष्ठ, रक्तपित्त, खूनी बवासीर, विसर्प, अम्लपित्त, वातरक्त, पांडु रोग, विस्फोट, यक्ष्मा, उन्माद, कामला, पामा, कण्डु, जीर्ण ज्वर, रक्तप्रदर आदि रोगों में शीघ्र लाभ मिलता है ! चर्म रोगों में इसका इस्तेमाल विशेष रूप से किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ६ से १० ग्राम, गर्म पानी के साथ, दिन में दो बार !!

        *!! महाचैतस घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह उन्माद एवं अपस्मार (मिर्गी) रोग, मस्तिष्क की दुर्बलता, गलदोष, प्रतिश्याय, तृतियक और चातुर्थिक ज्वर, श्वास - कास आदि रोगों में लाभ करता है ! मस्तिष्क, शुक्राशय व गर्भाश्य को ताकत प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, मिश्री के साथ चटाकर ऊपर से गौ-दुग्ध पिलाएं !!

       *!! बलादि घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह हृदय रोग, शूल, उर:क्षत, रक्तपित्त, खांसी आदि में लाभ करता है ! यह शरीर को बल प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, दूध या गर्म पानी में मिलाकर, दिन में दोबार !!

       *!! ब्राह्मी घृत !!*
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*गुण व अनुपान : -* यह दिमाग की कमजोरी हटाकर स्मरण शक्ति बढ़ाने वाला है ! इसके सेवन से अपस्मार, उन्माद, हकलापन बोलना, बुद्धि की निर्भबलता, मनोदोष, वातरक्त एवं कुष्ठ रोग आदि में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, बराबर मिश्री के साथ देकर ऊपर से दूध पिलाएं !!

       *!! फलकल्याण घृत !!*

*गुण व अनुपान: -* यह सभी प्रकार के स्त्री रोगों में लाभदायक है !!
   इसके सेवन से गर्भाश्य की कमजोरी, बार-बार गर्भपात होना, बांझपन, रजोदोष, कमर दर्द व शरीर की कमजोरी में शीघ्र लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ६ से १० ग्राम, मिश्री मिलाकर, गाय के दूध के साथ !!

        *!! पंचतिक्त घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से कुष्ठ, वात-पित्त एवं कफज रोग, दुष्टव्रण, कृमि रोग, अर्श, ज्वर, कास, रक्त व चर्म रोग आदि में लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, मिश्री के साथ चटाकर, ऊपर से गौ-दुग्ध पिलाएं !!

       *!! पंचगव्य घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह उन्माद एवं अपस्मार, क्षय, श्वास, पेट-दर्द, हाथ-पांव की सूजन, पेट की वायु, कब्ज, धातु क्षीणता, भगन्दर, पांडु-कामला, दमा-खांसी, हल्का बुखार आदि में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ५ से १० ग्राम, गर्म पानी के साथ !!

      *!! दूर्वादि घृत !!*

*गुण व अनुपान: -* शरीर के किसी भी अंग जैसे कान, आँख, नाक, लिंग, वृक्क आदि से रक्त निकलता हो ऐसी अवस्था में यह शीघ्र लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, बराबर मिश्री मिलाकर, दिन में दो बार !!

      *!! महात्रिफलादि घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह रक्तदृष्टि, रक्तस्राव, रतौंधी, तिमिर, आँखों में ज्यादा दर्द होना, आँखों से कम दिखार्इ पड़ना व अन्य प्रकार के नेत्ररोगों में लाभदायक है !!
     इसका विशेष उपयोग आँखों की तकलीफों में किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, बराबर मिश्री मिलाकर, दिन में दो बार !!

         *!! जात्यादि घृत !!*

              *(मरहम)*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से नाड़ीव्रण (नासूर), घाव, जले का घाव व अन्य प्रकार के गहरे घाव आदि में लगाने से लाभ मिलता है !!

          *!! चैतस घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसका मुख्यत: उपयोग मानसिक रोगों में किया जाता है ! यह उन्माद, रोग की प्रारम्भिक अवस्था, हिस्टीरिया, मिर्गी (अपस्मार), मूर्छा आदि रोगों में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १० ग्राम, गर्म दूध या पानी के साथ !!

      *!! चित्रकादि घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से तिल्ली, गुल्म, सूजन, उदर रोग, बवासीर, संगहणी, पुराना अतिसार, पेट फूलना व अरूचि आदि रोगों में शीघ्र लाभ करता है ! इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ५ से १० ग्राम, गर्म पानी के साथ !!

       *!! कामदेव घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह उत्तम पौष्टिक और वाजीकरण है ! यह वीर्यक्षय, शरीर की कृशता (दुबलापन) और नपुंसकता, रक्तपित्त, क्षत-क्षीणता, कामला, वातरक्त, हलीमक, पांडु, स्वरक्षय (गला बैठ जाना), मूत्रकृच्छ, हृदय की दाह एवं पसली के दर्द को दूर करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ६ से १५ ग्राम देकर ऊपर से गाय का दूध पिलाएं !!

       *!! अशोक घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह स्त्रियों के सभी प्रकार के प्रदर रोग, कुक्षि का दर्द, योनि की पीड़ा, मन्दाग्नि, अरूचि, पांडु, कामला, कमर दर्द, दुबलापन, श्वास आदि रोगों में लाभ करता है ! यह हाथ-पांव व आँखों की जलन, भूख कम लगना, कमर दर्द, सिर दर्द व स्त्रियों के अन्य रोगों में भी लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ५ से १० ग्राम, दिन में दो बार दूध या गर्म पानी के साथ !!

        *!! कल्याण घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह उन्माद, अपस्मार, हिस्टीरीया, दिमाग की कमजोरी, तुतलाना, अग्निमांद्य, पांडु, कण्डु, जहर, सूजन, प्रमेह, कास, श्वास, ज्वर, पारी का ज्वर, वातरोग, जुकाम, वीर्य की कममी, बांझपन, बुद्धि की कमी, कमजोरी, मूत्रकृच्छ, विसर्प आदि रोगों में लाभ करता है ! यह दिमाग व गर्भाश्य को ताकत देने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ५ ग्राम !!

       *!! कासीसादि घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इस घृत की शरीर पर मालिश करने से समस्त प्रकार के कुष्ठ, दाद, पामा, विचर्चिका, विसर्प, वातरक्त-जनित विस्फोट, सिर के फोड़े, उपदंश, नाड़ी व्रण, शोथ, भगन्दर, मकड़ी के विष-जनित फफोले आदि विकार नष्ट होते हैं !!
       यह घृत व्रणशोधक, व्रण रोपक और व्रण (फोड़ों के दागों) को मिटाकर त्वचा के वर्ण को सुधारता है !!

     *!! कुमारकल्याण घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से बल, वर्ण, रूचि, जठराग्नि, मेधा और कांति बढ़ती है ! दाँत आने के समय बालकों को इसके सेवन कराने से बिना तकलीफ के दाँत निकल आते हैं !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, गर्म दूध में डाल कर पिलाएं व बच्चों में आयु अनुसार !!

       *!! अश्वगन्धादि घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* यह सभी प्रकार के वात रोग, संधि-षूल ( जोड़ों का दर्द ), कमर दर्द, किसी भी अंग में कमजोरी, चक्कर आना, अनिन्द्रा आदि विकारों में शीघ्र लाभ प्रदान करता है !!
       यह सभी धातुओं को पुष्ट कर पौरूष शक्ति में वृद्धि करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, मिश्री के साथ चटाकर ऊपर से गो-दुग्ध पिलाएं !!

         *!! अर्जुन घृत !!*

*गुण व अनुपान : -* इसके सेवन से दिल की घबराहट, कमजोरी व इससे जुड़े अन्य रोग शीघ्र ठीक हो जाते हैं ! व हृदय की क्रिया को यह व्यवस्थित करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* ३ से ६ ग्राम, मिश्री के साथ चटाकर ऊपर से गो-दुग्ध पिलाएं !!

*!! इसी प्रति के साथ आयुर्वेदिक घृत प्रकरण समाप्त हुआ !!*

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आयुर्वेदिक क्वाथ/कषाय भाग २ !!* 🌺🙏🏻🌺

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक क्वाथ/कषाय भाग २ !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! प्रदरान्तक क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग : -* यह गर्भाश्य के रोगों को दूर करने वाला व रक्त प्रदर व श्वेत प्रदर में शीघ्र लाभ देने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २० से ४० ग्राम, दिन में दो बार अथवा आवश्यकतानुसार !!

       *!! धान्यपंचक क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग : -*  इसके सेवन से भूख खुल कर लगती है व पाचन शक्ति को बढ़ाता है ! यह सभी प्रकार के आातिसात, रक्तातिसार व पित्तातिसार में लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २० से ४० ग्राम, दिन में दो बार अथवा आवश्यकतानुसार !!

       *!! धान्यसप्तक क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग : -* इसके सेवन से भूख खुल कर लगती है ! व पाचन शक्ति को बढ़ाता है ! यह सभी प्रकार के आातिसात, रक्तातिसार व पित्तातिसार में लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* चिकित्सक के परामर्स अनुसार !!

       *!! देवदार्वादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग : -* इसके सेवन से श्वास, सिर का दर्द, खांसी, बेहोशी, आदि में लाभ मिलता है ! प्रसव के पश्चात् इसका सेवन विशेष रूप से उपयोग किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान : -* २० से ४० ग्राम, दिन में बार !!

       *!! द्राव्यादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से सभी प्रकार के प्रदर रोग, कमजोरी, सिरदर्द, मंद ज्वर आदि में लाभ मिलता है ! यह गर्भाशय को ताकत प्रदान करता है !!

           *!! दशमूल क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से प्रसव के बाद की कमजोरी, खांसी, श्वास, चक्कत आना, सूजन, प्रसूत ज्वर, नींद न आना, खून की कमी, आदि !!

          *!! दाड़िम पुटपाक !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से अतिसार, प्यास, दाह, रक्तपित्त आदि रोगों में लाभ मिलता है !!

         *!! त्रिफलादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* यह पांडु रोग, कामला और हलीमक आदि रोगों में लाभदायक है !!

         *!! तारूण्यादि कषाय !!*

              *(दस्तावर)*
*गुण व उपयोग: -* यह दस्तावर है ! कोमल प्रकृति वालों के लिए यह पेट साफ करने की उत्तम औषधी है !!

       *!! त्रिकण्टकादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से पत्थरी टूटकर बाहर निकलती है व मूत्रकृचछ एवं मूत्रत्घात में लाभदायक है !!

         *!! तगरादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* यह सन्निपाद, पतले दस्त आदि में लाभदायक है !!

           *!! जन्मघूंटी !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से बच्चों के सभी प्रकार के रोग नष्ट होते हैं ! यह बच्चों के उल्टी, खांसी, जुकाम, सर्दी, दस्त, अपचन आदि !!

           *!! जात्यादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से मुंह के छाले, गले के जख्म, फोड़े-फुंसी व अन्य रक्त विकारों में लाभ मिलता है !!

       *!! गुलबनफ्सादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से सर्दी जुकाम, श्वास व कफ रोगों में ला मिलता है !!

         *!! गुडूच्यादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* इसके सेवन से सभी प्रकार के ज्वर, दाह, जी मिचलाना, वमन, अरूचि आदि में लाभ मिलता है !!

         *!! गोजिव्हादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* यह सर्दी, जुकाम, खाँसी, श्वास, कफ रोग आदि में लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान: -* २० से ४० ग्राम, दिन में दो बार !!

        *!! कमलादि फाण्ट !!*

*गुण व उपयोग: -* यह हृदय को लाभ देने वाला व पेशाब खुलकर लाने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान: -* ३० से ६० ग्राम, दिन में दो बार !!

         *!! अमृताष्टक क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* यह पित्त एवं कफजन्य ज्वर, जी मिचलाना, अरूचि, वमन, अधिक प्यास लगना, पेट, हाथ-पैर और आँखों में जलन आदि में लाभ करता है !!

        *!! आरग्वधादि क्वाथ !!*

            *(दस्तावर)*
*गुण व उपयोग: -* पुरानी कब्ज, पेट की सूजन, शरीर की सूजन, हल्का बुखार, पेट का कड़ापन, वायु भरना, भूख की कमी आदि !!

        *!! अभयादि क्वाथ !!*

*गुण व उपयोग: -* यह पाचन, दीपन, मल-मूत्र एवं वायु के विबंध (कब्ज) को दूर करने वाला, श्वास, तन्द्रा, वमन, मुँह का सुखना, प्यास, खाँसी, आदि !!

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नाखून सड़ना ,पेरोनिसिया ,हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना.

  पेरोनिसिया  हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना. आयुर्वेदिक  मुलेठी 50ग्राम बडी सोफ 50 ग्राम  अच्छी हळदी 50 ग्राम  नीम पत्ते चुर्ण 50 ग्राम  ...