रविवार, 15 अक्टूबर 2017

आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ५

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ५ !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! जातिफलादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह ग्रहणी, क्षय, हैजा अपचन, आध्मान शूल, पेट की मरोड़, दर्द होकर दस्त आना, मन्दाग्नि, अतिसार, अरूचि, कास- श्वास, पीनस, पुराना जुकाम आदि रोगों में विशेष लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से २ ग्राम, दिन में दो बार अथवा आवश्यकतानुसार !!

           *!! चोपचिन्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से घाव, सिर के फोड़े-फुंसी, मुँह के छाले, शरीर के अन्य भागों के जख्म, प्रमेह, उपदंश, सूजाक, खूजली, वीर्यविकार, कमजोरी, ‌‌‌नपुंसकता आदि में लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार पानी या दूध के साथ !!

           *!! चित्रकादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह दीपन-पाचन एवं अग्निवद्​र्धक है ! यह आमवात, सर्वांगशूल, उदरशूल, आमाश्य शोथ, अरूचि, मन्दाग्नि, पेट में वायु का इकट्ठा होना, संग्रहणी, गुल्म, प्लीहा, आदि रोगों में लाभकारी है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार गर्म पानी या छाछ के साथ !!

            *!! चातुर्जात चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* अग्निवर्द्धक, दीपक, पाचक एवं विषनाशक !!

*मात्रा व अनुपान -* १/२ से १ ग्राम दिन में तीन बार शहद से !!

           *!! चन्दादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण रक्त प्रदर, रक्तातिसार, खूनी बवासीर और रक्तपित्त आदि में विशेष लाभदायक !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार शहद के साथ; रक्त प्रदर में अशोक क्वाथ के साथ !!

          *!! गोक्षुरादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण वृष्य, बल-वीर्य वद्​र्धक और कामोत्तेजक है ! इसके सेवन से वीर्य का पतलापन दूर होकर गाढ़ा हो जाता है ! सम्भोग से एक घण्टा पहले मिश्री मिले हुए गर्म दूध के साथ सेवन करने से विशेष परिणाम मिलते हैं !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार अथवा रात को सोते समय !!

           *!! गंगाधर चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के सेवन से प्रवाहिका, अतिसार एवं संगहणी, आंतों की कमजोरी आदि में उत्तम लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में दो बार रोगानुसार अनुपान के साथ !!

           *!! कृष्णादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह छोटे बच्चों में विशेष लाभ प्रदान करता है ! इसके सेवन से छोटे-छोटे बच्चों की संग्रहणी, अतिसार, दूध न पचना, पेट फूलना या दर्द होना, ज्वर, खाँसी आदि में विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ५०० से ७५० मिलीग्राम, दिन में दो बार अथवा आवश्यकतानुसार !!

          *!! कृमिघ्न चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह पेट के कीड़े, कब्ज, जी मिचलाना आदि में लाभकारी है ! पेट के कीड़ों को नष्ट करने हेतु उपयोग करते समय इसके सेवन से कुछ समय पहले कुछ मीठा खाकर इसके पश्चात इसका सेवन करना चाहिए !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन मे दो बार गर्म पानी के साथ !!

          *!! कुकुंमादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह बाजीकरण, शक्तिवद्​र्धक तथा दीपक-पाचक है ! यह अजीर्ण, ग्रहणी, क्षय, कास-श्वास, खाँसी, अग्निमाद्य, वात-पित, वमन, अतिसार, नेत्ररोग, कफ जन्य रोग, उबकाई, अरूचि, उदररोग, मुत्रकृच्छ, शिरोशिश आदि रोगों में उत्तम लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार दूध अथवा जल के साथ !!

          *!! कामदेव चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से शुक्र विकार, शीघ्रपतन, व स्वप्नदोष, वीर्य का पतलानप आदि को दूर कर शक्ति प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

         *!! कर्पूरादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह अरूचि, खाँसी, वमन, हृदय की कमजोरी, नाड़ी की विषमता, रक्तचाप में कमी, भूख कम लगना, स्वरभंग, श्वास, गुल्म, अर्श और कंठ रोग आदि में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में बार ठंडे पानी अथवा छाछ के साथ !!

         *!! कर्कटी बीज चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से पेशाब खुलकर आता है ! पेडू में सूजन, जननेन्द्रिय की नसों में खिंचाव आदि में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ ग्राम, दिन में दो बार गर्म पानी के साथ !!

          *!! कमलाक्षादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण पौष्टिक, शक्तिवद्​र्धक, कामोत्तेजक व शरीर की कमजोरी को दूर करने वाला है ! इसका उपयोग साधारणतय: सर्दी के मौसम में किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

           *!! एलादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण वमन, छर्दि एवं पित्तजन्य विकार, प्यास की अधिकता, कण्ठ सूखना, हाथ, पांव और आंखों में जलन होना, अरुचि व मंदाग्नि आदि रोगों में लाभ करता है ! वमन के कारण पानी भी न पचने के मामले में यह चूर्ण शीघ्र लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार मिश्री या शहद के साथ !!

         *!! आमलक्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह सभी प्रकार के ज्वरों में उपयोगी है ! यह दस्तावर, अग्निवर्द्धक, रुचिकर एवं पाचक है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में दो बार पानी के साथ !!

    *!! आमलकी रसायन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* पौष्टिक, पित्त नाशक व रसायन है ! नियमित सेवन से शरीर व इन्द्रियां दृढ़ होती हैं ! यह चूर्ण ज्वर, मोतियाबिंद, बालों का झड़ना, खूनी वमन, अधिक प्यास लगना, रक्तप्रदर, कमजोर योनि, योनि में जलन व खुजली एवं कुकुणक इत्यादि रोगों में लाभदायक है !!

*संघटक -* आमलकी (बीज रहित फल) का बारीक चूर्ण लें ! इस चूर्ण को आमलकी के ही रस में रस सूखने तक छाया में मर्दन करें !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

         *!! अष्टांग लवण चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* ‌‌‌यह स्वादिष्ट तथा रुचिवर्द्धक है ! यह चूर्ण मंदाग्नि, अरुचि, भूख न लगना आदि पर विशेष लाभकारी !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ५ ग्राम भोजन के पश्चात या पूर्व, थोड़ा-थोड़ा खाना चाहिए !!

        *!! अश्वगन्धादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के सेवन से वीर्य विकार, शुक्रक्षय, वीर्य का पतलापन व शिथिलता, शीघ्रपतन, प्रमेह आ​दि विकार नष्ट होकर वीर्य गाढ़ा और निर्दोष बनाता है ! यह चूर्ण विशेषतय: वीर्यवाहिनी नाडि़यों, वातवाहिनी नाडि़यों और मस्तिष्क और हृदय को लाभ पहंचाता है ! यह शरीर को बल प्रदान कर शक्तिवद्​र्धक बनाता है ! यह शरीर की झुर्रियों को दूर करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, गर्म पानी के साथ दिन में दो बार !!

        *!! अविपत्तिकर चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* अम्लपित्त की सर्वोत्तम दवा !!
यह छाती और गले की जलन, खट्टी डकारें, कब्जियत आदि पित्त रोगों के सभी उपद्रव इसमें शांत होते हैं ! इसके सेवन से कब्ज दूर होती है ! व यह भूख जगाने वाला है ! अम्लपित आदि के उपचार से पूर्व इसके सेवन से पेट साफ करके इसके पश्चात् उपचार शुरू करने से विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार ठंडे पानी साथ !!

          *!! अर्जुन त्वक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह शीतल, हृदय को हितकारी, कसैला और क्षत, क्षय, विष, रुधिर विकार, मेद, प्रमेह, व्रण, कफ तथा पित्त को नष्ट करता है ! यह चूर्ण हृदयशूल, अस्थिभंग, खांसी आदि में लाभकारी है ! इससे हृदय की पेशियों को बल मिलता है, स्पन्दन ठीक व सबल होता है तथा उसकी प्रतिमिनट गति भी कम हो जाती है ! स्ट्रोक वाल्यूम तथा कार्डियक सशक्त व उत्तजित होता है ! इनमें रक्त स्तंभक व प्रतिरक्त स्तंभक दोनों ही गुण हैं ! अधिक रक्तस्राव होने की स्थिति से या कोशिकाओं की रुक्षता के कारण टूटने का खतरा होने पर यह स्तंभक की भूमिका निभाता है, लेकिन हृदय की रक्तवाही नलिकाओं (कोरोनरी धमनियों) में थक्का नहीं बनने देता तथा बड़ी धमनी से प्रति मिनट भेजे जाने वाले रक्त के आयतन में वृद्धि करता है !!

*संघटक -* अर्जुन की छाल ‌‌‌पीसी हुई ! ‌‌‌काढ़ा बनाने के लिए - अर्जुन की छाल को ४०० ग्राम लेकर ५०० मिली पानी में पकाये २०० मिली रहने पर उतार लें व ठण्डा होने के उप्रान्त सेवन करें !!

*मात्रा व अनुपान -* ५ से १० ग्राम चूर्ण दिन में दो बार !!

*‌‌‌काढ़ा -* १० मि.ली., दिन में दो बार - सुबह-शाम ! अर्जुन की छाल के चूर्ण को चाय के साथ उबालकर पीने से हृदय और उच्च रक्तचाप की समस्याओं में तेजी से आराम मिलता है ! चाय बनाते समय एक चम्मच इस चूर्ण को डाल दें तो इससे उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है ! अर्जुन की चाय हॄदय विकारों से ग्रस्त रोगियों के लिए काफी फायदेमंद होती है ! अर्जुन की छाल का चूर्ण (१ ग्राम) एक कप पानी में खौलाकर उसमें दूध व चीनी आवश्यकतानुसार मिलाकर पिएं तो फायदा होता है !!

        हृदय की सामान्य धड़कन जब ७२ से बढ़कर १५० से ऊपर रहने लगे तो एक गिलास टमाटर के रस में एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से शीघ्र ही धड़कन सामान्य हो जाती है !!

           *!! अजमोदादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से सभी प्रकार के दर्द में उत्तम लाभ होता है ! यह सूजन, आमवात, गठिया, गुध्रसी, कमर, पीठ जंघा आ​दि के दर्द में  लाभकारी है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, ​दिन में दो बार ठंडे पानी के साथ !!

          *!! अग्निमुख चूर्ण ब्रहत !!*

*गुण व उपयोग -* यह अत्यन्त अग्नि दीपक है ! यह १० या १५ मिनट के अन्दर सभी खाये हुये खाद्य पदार्थॊ को पचा देता है ! इस चूर्ण को खाने का सबसे अच्छा तरीका यह है ! कि इसे भोजन के साथ मिलाकर खाना चाहिये ! इस चूर्ण को खाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे भोजन के साथ मिलाकर खाना चाहिये !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में बार गर्म पानी या दही के साथ !!

           *!! अग्निमुख चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण दीपन-पाचन है ! यह खट्टी डकारें आना,गुल्म, श्वास, अरूची उदरशूल, मन्दाग्नि, जी मिचलाना या मुँह में पानी भर जाना, भूख न लगना आ​दि विकारों को नष्ट करता है ! भोजन को अच्छी तरह पचा कर क्षुधा की वृ​द्धि करता है ! विशेषतय: उदर वायु पचाकर क्षुधा की वृ​द्धि करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, भोजन के बाद सुबह-शाम पानी के साथ !!

*नोट :-* सभी चूर्ण डाबर व वैद्यनाथ की दुकान पर मिल जाते हैं !!

*!! इसी के साथ चूर्ण प्रकरण का अंक समाप्त हुआ !!*

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शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

*!! वचन सिद्धी साधना !!*

🌺🙏🏻🌺 *!! वचन सिद्धी साधना !!* 🌺🙏🏻🌺

    जो बोलेगे वह सत्य होगा क्यूंकी वचन सिद्धी एक प्रकार की वाणी सिद्धी हि है ! और बहोत समय बाद यह साधना करने का मुहूर्त आया है ! पूर्णिमा के चौथे दिन से साधना प्रारंभ करना है ! माला रुद्राक्ष का हो ! आसन वस्त्र कोई भी चलेगे परंतु लाल रंग के रहे तो ठिक है ! दिशा उत्तर के तरफ़ मुख हो जाप के समय ! साधना रात्री मे ९ बजे के बाद करे !!

*मंत्र :-*

*!! काली काली महाकाली,इंद्र की बेटी ब्रम्हा की साली,तीन सौ पैसठ काम श्री राजा रामचंद्र के,लंका नाशय के मेरी बाचा सिद्ध करके लावे तो सच्ची काली महाकाली कहावे,मेरी भक्ति गुरू की शक्ती,फुरो मंत्र ईश्वरीय वाचा !!*

*विधि :-*

  एक पान का बीडा सिर्फ शनिवार के रात मे महाकाली को चढाये बाकी दिन नही और साथ मे एक नारियल,चढाइ हुयी सामग्री दूसरे दिन सुबह निर्जन स्थान पर रखे ! मंत्र को १०८ बार पढके एक ग्लास पानी मे ३ फुंक लगाकर ११ दिन पिये और ग्यारहवां दिन अमावस्या होना चाहिये ! इसलिये यह साधना महत्वपूर्ण है !!

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महाकाली का शाबर मंत्र

🌺🙏🏻🌺 *!! महाकाली का शाबर मंत्र !!* 🌺🙏🏻🌺

     माता महाकाली का शाबर मंत्र अत्यंत दुर्लभ और तीव्र प्रभावशाली है !!
         इस मंत्र को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ विधि पूर्वक जपकर सिद्ध कर लिया जाये तो साधक की सभी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती है ! और साधक संपूर्ण सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य एवं धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है ! साथ ही साथ समस्त प्रकार की बाधायें भी स्वतः ही दूर हो जाती है !!

      *!! महाकाली शाबर मंत्र !!*

*!! "सात पुनम कालका, बारह बरस क्वांर !*
*एको देवि जानिए, चौदह भुवन द्वार !!*
*द्वि-पक्षे निर्मलिए, तेरह देवन देव !*
*अष्टभुजी परमेश्वरी, ग्यारह रूद्र सेव !!*
*सोलह कला सम्पुर्णी, तीन नयन भरपुर !*
*दशों द्वारी तू ही माँ, पांचों बाजे नूर !!*
*नव-निधि षट्-दर्शनी, पंद्रह तिथि जान !*
*चारों युग मे काल का कर काली कल्याण" !!*

       इस मंत्र के द्वारा जन कल्याण तथा परोपकार भी किया जा सकता है ! साधक इस मंत्र के द्वारा किसी भी बाधाग्रस्त व्यक्ति जैसे भूत प्रेतबाधा, आर्थिक बाधा, नजर दोष, शारीरिक मानसिक बाधा इत्यादि को आसानी से मिटा सकता है !!

           *-: प्रयोग विधी :-*

       किसी भी होली, दीपावली, नवरात्रि, अथवा ग्रहण काल में इस प्रयोग को सिद्ध करना चाहिए ! सर्वप्रथम निम्न सामग्रीयाँ जुटा लें ! महाकाली यंत्र, महाकाली चित्र, कनेर का पीला फूल, भटकटैया का फूल, लौंग, इलायची, ३ निंबू, सिन्दूर, काले केवाच के १०८ बीज धूप, दीप, नारियल, अगरबत्ती इत्यादी !!

         माता काली के मंदिर में या किसी एकान्त स्थान में इस साधना को सिद्ध किये जा सकते हैं !!
        सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत होकर एक लकड़ी के तख्ते पर लाल वस्त्र बिछाकर महाकाली चित्र तथा यंत्र को स्थापित करें तत्पश्चात घी का चैमुखा दिया जलाकर गुरू गणेश का ध्यान कर गुरू स्थापन मंत्र तथा आत्मरक्षा मंत्र का प्रयोग करें ! फिर भोजपत्र पर निम्न चौंतीसा यंत्र का निर्माण करें तथा महाकाली यंत्र, महाकाली चित्र सहित चौंतीसा यंत्र का पंचोपचार या षोड़शोपचार से पूजन करें !!
        पूजन के समय कनेर, भटकटैया के फूल को यंत्र चित्र पर चढ़ायें, नारियल इलायची, पंचमेवा का भोग लगायें, फिर तीनों निम्बूओं को काटकर सिन्दूर का टीका लगाकर अर्पित करें तत्पश्चात हाथ में एक-एक केवाच के बीजों को लेकर उक्त मंत्र को पढ़ते हुए काली के चित्र के सामने चढ़ाते जायें इस तरह १०८ बार मंत्र जपते हुए केवाच के बीजों को चढ़ायें ! मंत्र जप पुर्ण होने पर उसी मंत्र से ११ बार हवन करें ! एक ब्राम्हण को भोजन करायें तथा यथाशक्ति दान दक्षिणा दें ! फिर इस मंत्र का प्रयोग किसी भी इछित कार्य के लिये कर सकते हैं !!

*-: प्रयोग नीचे लिखे अनुसार करें :-*

*१ - भूत-प्रेत बधा निवारण :-*
        हवन के राख से किसी भी भूत-प्रेत ग्रस्त रोगी को सात बार मंत्र पढ़ते हुए झाड़ दें तथा हवन के राख का टीका लगा दें फिर भोजपत्र पर चौंतिसा यंत्र को अष्टगंध से लिख कर तांबे के ताबीज में भर कर पहना दें तो भूत प्रेत बाधा सदा के लिए दूर हो जाती है !!

*२ - शत्रु बाधा निवारण :-* अमावस्या के दिन एक़ निंम्बू लेकर उस पर सिंदुर से शत्रु का नाम लिखकर महाकाली मंत्र का उच्चारण करते हुये २१ बार ७ सुइयां चुभाये फिर उसे श्मशान मे ले जाकर गाड़ दें तथा उस पर शराब की धार चढ़ायें ऐसा करने से ३ दिनों मे शत्रु बाधा समाप्त हो जाती है !!

*३ - आर्थिक बाधा निवारण :-*
       महाकाली यंत्र के सामने घी का दीपक जलाकर महाकाली शाबर मंत्र का २१ बार जाप २१ दिनों तक करने से आर्थिक बाधा समाप्त हो जाती है !!

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आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ४

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ४ !!* 🌺🙏🏻🌺

        *!! पंचकाल चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से अफारा, गुल्म, प्लीहावृद्धि, अरूचि आदि में उत्तम लाभ मिलता है !!
      यह दीपन-पाचन है ! इसके सेवन से पेट के रोगों में विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में २ - ३ बार गर्म पानी के साथ लें !!

        *!! निम्बादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह वातरक्त, सफेद कोढ़, आमवात -जन्य शोथ- उदर रोग, पांडु, दाद, शरीर पर लाल चकते पड़ जाना, कामला, गुल्म एवं फोड़ा -फुंसी, कुष्ट, खुजली, चर्म रोग आदि रक्त-विकारों में लाभ प्रदान करता है !!
*मात्रा व अनुपान -* १ से ४ ग्राम, दिन में दो बार ठण्डे पानी के साथ !!

        *!! नित्यानन्द चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* रोगानुसार इसके सेवन करने से बहुत रोगों में आती है ! यह हृदयरोग, पांडु, खाँसी, श्वास (asthma) भगंदर, अग्निमांद्य, ज्वर, कुष्ठ, ग्रहणी, गलग्रह, विष आ​दि रोगों में उपयोग की जाती है !!

*मात्रा व अनुपान -* ‌‌‌१ से २ ग्राम, दिन में दो बार !!

           *!! नारायण चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह पेट के रोगों में विशेष लाभदायक है ! कब्ज, गैस, भूख न लगना आदि में यह लाभदायक है ! शोथ रोग में भी इसका उपयोग किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार !!

         *!! नागकेसरादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* पित्त अतिसार व रक्त अतिसार में लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम, दिन में दो बार पानी के साथ !!

           *!! नरसिंह चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण उत्तम बाजीकरण, बलवद्​र्धक व रसायन है !!
          यह रसरक्तादि धातुओं की वृ​द्धि कर शरीर में नयी स्फूर्ति तथा बल, वर्ण एवं वीर्य की वृ​द्धि करता है और कामोत्तेजना को बढ़ाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार !!

       *!! नमक सुलेमानी चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण अत्यन्त स्वादिष्ट, रूचिवद्​र्धक एवं उत्तम दीपनपाचन है ! यह अजिर्ण, अरूचि, उदर शूल, अफारा, प्लीहावृद्धि, यकृत विकार, गुल्म (वायु गोला) आदि में लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, भोजन के बाद पानी के साथ !!

        *!! धातुपौष्टिक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण धातु वर्धक एवं वीर्य को गाढ़ा करने वाला है ! इसके सेवन से धातु गाढ़ा हो जाता है ! एवं स्वप्नदोष दूर हो कर शरीर हृष्ट-पुष्ट बन जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ५ से १० ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

*विशेष : -* यह चूर्ण गरिष्ठ (देर में पचने वाला) है ! इसलिए इसका सेवन मन्दाग्नि वाले को नही करना चाहिए ! जिनकी जठराग्नि तेज हो वही इसे सेवन से लाभ उठा सकते हैं ! इसके सेवन काल में गाय के दूध का सेवन अवश्य करना चाहिए !!

        *!! द्राक्षादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह अम्लपित्त, छर्दि, मुर्छा, अरूचि, प्रदर, पांडु, कामला एवं यक्ष्मा आदि रोगों में लाभदायक है ! व शरीर को शक्ति प्रदान करने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार ठण्डे पानी के साथ !!

        *!! दाड़ीमास्टक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह आमातिसार, अग्निमान्द्य, अरूचि, खाँसी, हृदय की पीड़ा, पसली का दर्द, ग्रहणी एवं गुल्म रोग आदि में लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम, दिन में दो बार गर्म पानी के साथ !!

         *!! दशांगलेप !!*

*गुण व उपयोग -* रूग्ण स्थान पर इस लेप के प्रयोग से समस्त प्रकार के कठिन विसर्प रोग नष्ट होते हैं ! इसके अतिरिक्त कुष्ठ, ज्वर, शोथ समस्त शरीर में होने वाला दाह विस्फोट, दुष्टव्रण, शिर:शूल आदि विकार नष्ट होते हैं !!

*लेप विधि -* इस चूर्ण को पानी के साथ पीस कर चूर्ण से पांचवा भाग गोघृत मिलाकर लेप करें !!

       *!! दशन संस्कार चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह मंजन दंत और मुंह के रोगों को नष्ट करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* दिन में २ से ३ बार यह मंजन करना चाहिए !!

       *!! दंत मंजन लाल चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* सुबह - शाम इस्तेमाल करने से पीप निकलना, दंत कृमि, मसूड़ों का फूलना, दर्द करना आदि बिमारीयाँ दूर होती हैं ! और दाँत स्वच्छ तथा निरोग रहते हैं !!

*मात्रा व अनुपान -* एक बार दंत मंजन में पर्याप्त मात्रा !!

             *!! त्रिफला चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से कब्ज हटकर दस्त खुलकर आते हैं ! इसके अलावा प्रमेह रोग, मूत्र का अधिक आना, मूत्र का गंदलापन होना, शोथ, पांडुरोग,
कामला, रक्त विकार, नेत्रविकार और विषम ज्वर आदि में इसका सेवन लाभदायक है ! यह भूख को बढ़ाने वाला है ! इसके पानी से आंखें धोने से नेत्र ज्योति बढ़ती है !!

              *- संघटक -*
‌‌‌हरीतकी, बहेड़ा व आंवला, सभी सम भाग !!

*मात्रा व अनुपान -* ४ से ८ ग्राम, रात को सोते समय गर्म पानी के साथ !!

        *!! तीक्ष्णविरेचन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* पुराने कब्ज को नष्ट करने के लिए इस चूर्ण का सेवन अत्यन्त गुणकारी है ! यह चूर्ण जठराग्नि को प्रदीप्त करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ६ ग्राम, रात को सोने से १ घण्टा पूर्व गर्म पानी के साथ !!

          *!! तिल सप्तक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* बवासीर, पान्डु, कृमि, कास, मन्दाग्नि, ज्वर, गुल्म आदि रोगों में लाभदायक हैं !!

                 *-: संघटक :-*
तिल , चित्रक , सोंठ , मिर्च काली , पीपल छोटी , वाय विडन्ग , बडी हरड़ !!
        इन सभी घटकों का चूर्ण बना लें ! चूर्ण बनाने के लिये पहले सभी घटकों के छोटे छोटे टुकडे कर लें फिर मिक्सी अथवा इमाम दस्ते या खरल में डालकर महीन चूर्ण बना लें !!

*मात्रा व अनुपान -* ‌‌‌३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार गुड़ के साथ !!

          *!! तालिसादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण खाँसी, विशेषकर सूखी खाँसी, जीर्णज्वर, अग्निमान्द्य, संग्रहणी, अरूचि एवं पाचन- शक्ति की कमी आदि रोगों में लाभदायक है ! यह पाचन शक्ति को मजबूत कर भूख बढ़ाने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार !!

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आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ३

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक चूर्ण भाग ३ !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! प्रदरनाशक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से समस्त प्रकार के प्रदर रोग शीघ्र नष्ट होते हैं !!
        यह रक्त प्रदर, योनी शूल, रक्त अतिसार, रक्तार्श, कृमि रोग, आंव मिश्रित रक्त अतिसार, गर्भाशय की कमजोरी में विशेष लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, शहद के साथ चाट कर उपर से चावल भिगो कर बनाया गया ‌‌‌पानी पीयें !!

           *!! पुष्यानुग चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* स्त्रियों के प्रदर रोग की उत्तम दवा है !!
        इस चूर्ण के सेवन से योनि रोग, योनिक्षत, बादी तथा खूनी बवासीर, नीला व पीला योनि स्राव (प्रदर), योनिदाह, रक्त प्रदार, श्वेत प्रदर, अतिसार, दस्त में खून आना, कृमि एवं खूनी आंव आदि रोगों में लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम, दिन में दो बार !!

         *!! पुष्पावरोधग्न चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* स्त्रियों को मासिक धर्म न होना या कष्ट होना तथा रुके हुए मासिक धर्म को खोलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ६ से १२ ग्राम दिन में तीन समय गर्म जल के साथ !!

          *!! पुनर्नवा चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह समस्त प्रकार की सूजन में विशेष लाभ करता है ! इसके सेवन से उदर रोग, पेशाब की रूकावट, पेशाब खुल कर न आना आदि में लाभ मिलता है !!
      किन्तु वैद्यगण इसका अधिकतम प्रयोग शरीर के किसी भी भाग की सूजन को हटाने के लिए करते हैं !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ ग्राम की मात्रा में गौमूत्र के साथ !!

        *!! पामारि प्रलेप !!*

*गुण व उपयोग -* सरसों के तेल में मिलाकर खूजली पर मालिश करने से ३ - ४ दिन के अन्दर ही खूजली को आराम हो जाता है ! यह दवा तेज है, अत: पहले बहुत कम चूर्ण तेल में मिला कर मालिश करें !!
        जैसे-जैसे सह्य होता जाए, वैसे-वैसे दवा की मात्रा बढ़ाकर लगानी चाहिए ! यह सुकुमार प्रकृति वालों को उपयोग ‌‌‌नही करना चाहिए !!

        *!! पंचसम चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसका उपयोग पेट के रोगों में किया जाता है ! यह पेट का दर्द, पेट का फूलना, गुल्म, तिल्ली, कब्ज आदि में लाभ दायक है ! यह पाचन क्रिया को मजबूत करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ ग्राम, दिन में दो बार पानी के साथ !!

          *!! पंचसकार चूर्ण !!*

*(विरेचक चूर्ण )*

*गुण व उपयोग -* यह कब्ज को दूर करने वाला व पाचन शक्ति को मजबूत कर भूख बढ़ाने वाला है। कब्ज हेतु इसका विशेष उपयोग होता है !!

*मात्रा -* रोगी के अनुसार ३ से ५ ग्राम सुबह साम प्रयोग करें !!

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नाखून सड़ना ,पेरोनिसिया ,हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना.

  पेरोनिसिया  हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना. आयुर्वेदिक  मुलेठी 50ग्राम बडी सोफ 50 ग्राम  अच्छी हळदी 50 ग्राम  नीम पत्ते चुर्ण 50 ग्राम  ...