शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

आयुर्वेदिक चूर्ण भाग २ !

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक चूर्ण भाग २ !!* 🌺🙏🏻🌺

          *!! मन्जिष्ठादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -*  यह चूर्ण दस्त और पेशाब साफ लाने वाला और रक्त शोधक है ! मल-मूत्र की रूकावट, अर्श (बवासीर) और रक्त-विकार में इसका इस्तेमाल लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ४ से ६ ग्राम, रात्रि को सोते समय अथवा प्रात: काल में एक बार !!

            *!! मधुविरेचन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण कोष्ठ-शुद्धि के लिए तथा आँव के दस्तों में विशेष गुणकारी है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार पानी के साथ !!

        *!! मधुयष्ट्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से कब्ज हट कर पेट साफ हो जाता है ! कमजोर प्रकृति वालों के पेट साफ करने हेतु इस चूर्ण का उपयोग किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, गर्म पानी से रात को सोते समय !!

             *!! मदयन्त्त्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण रक्त शोधक और साधरण रेचक है ! खूजली, फोड़ा-फुंसी आदि रक्त-विकार होने पर इस चूर्ण के उपयोग से बहुत लाभ होता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से २ ग्राम, दिन में २-३ बार पानी के साथ !!

         *!! मदनप्रकाश चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण पौष्टिक रसायन और बाजीकरण है ! इसके सेवन से बल और वीर्य की वृद्धि तथा प्रमेह का नाश होता है !!

              *- संघटक -*
ताल मखाना १ भाग
मूसली १ भाग
विदारीकन्द १ भाग
सोठ १ भाग
अश्वगन्धा १ भाग
कौन्च के बीज १ भाग
सेमर के फूल १ भाग
बीज बन्द १ भाग
शतावर १ भाग
मोचरस १ भाग
गोखरू १ भाग
जायफल १ भाग
घी में भूनी ऊड़द की दाल १ भाग
पोस्तादाना १ भाग
बन्सलोचन १ भाग
       यह सभी घटक बराबर मात्रा में लेकर महीन से महीन चूर्ण बना लें और इस सभी घटकों के चूर्ण के हिस्से के बराबर शक्कर लें और इस शक्कर को महीन से महीन पीसकर इस चूर्ण में मिला लें !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार दूध या पानी के साथ !!

           *!! भृंगराज चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* ‌‌‌यह असमय बाल सफेद होना, असमय बालों का छड़ना आदि समस्याओं की रोकथाम में लाभ पहुंचाता है !!
       नित्य सोते समय रात्रि में चालीस दिन सेवन करने से कमजोर दृष्टी आदि सब प्रकार के नेत्र रोगों में लाभ होता है !!

               *- संघटक -*
    भृंगराज के पत्तों को छाया में सुखाकर पीस लें !!

*मात्रा व अनुपान -* एक चम्मच, दिन में एक बार पानी के साथ !!
      भृंगराज चूर्ण १० ग्राम चूर्ण, शहद ३ ग्राम और गाय का घी ३ ग्राम रात को कमजोर दृष्टी के लिए !!

            *!! भूनिम्बादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के सेवन से ज्वरातिसार, ग्रहणी, कामला, पांडु, प्रमेह, अरूचि आदि रोग नष्ट होते हैं ! आंव को नष्ट करने एवं रक्तातिसार को मिटाने के लिए यह गुणकारी है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम, दिन में दो बार गुड़ के शर्बत या छाछ के साथ !!

             *!! बिल्वादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण अतिसार, प्रवाहिका, दस्त के साथ रक्त आना आदि में अनुपान भेद के साथ सेवन करने से लाभ प्रदान करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में २-३ बार ठण्डे पानी या अनार के रस अथवा छाछ के साथ !!

           *!! बिल्वफलादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* अतिसार रोग के लिए यह उत्तम दवा है ! तक्र के साथ इसका उपयोग किया जाता है ! संग्रहणी में भी लाभदायक है ! यह चूर्ण संग्राही है ! अर्थात पतले दस्त को रोकता तथा आंतों को बलवान बनाता है ! इस चूर्ण के सेवन से आम और संग्रहणी नष्ट हो जाती है ! संग्रहणी की पुरानी अवस्था में आंते खराब हो जाती हैं ! अर्थात आंतें दिल जाती हैं ! जिससे दस्त के समय थोड़ा सा भी जोर लगाने पर आंव के साथ दर्द एवं खून निकल आता है। जब तक वह खून और आंव नही निकल जाते, तब तक बहुत दर्द होता रहता है ! ऐसी अवस्था में इस चूर्ण के सेवन से आंतों की खराश भर जाती है ! तथा आंतें बलवान होकर अपने कार्य में समर्थ हो जाती हैं ! और आंव भी जो आमाश्य में संचित हुआ रहता है, बहुत शीघ्र निकल जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, मिद में दो बार दूध या ठण्डे पानी के साथ !!

          *!! बालचातुर्भाद चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसका प्रयोग बच्चों में विशेषतय: किया जाता है ! यह बच्चों के ज्वर, अतिसार, खाँसी, वमन व दाँत निकलने के समय की तकलीफों में लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २५० से १००० मिलीग्राम, शहद के साथ !!

        *!! बाकुचिकाद्य चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह सभी प्रकार के रक्त विकार, कुष्ट, वात रक्त, शरीर पर होने वाली छोटी-छोटी फुन्यिाँ आदि में लाभ करता है ! यह रक्त शोधक, विरेचक एवं कुष्टघ्न है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार पानी के साथ !!

           *!! बज्रक्षार चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण गुल्म, शूल, अजिर्ण, शोथ, कब्ज, सब प्रकार के उदर रोग, अग्निमान्द्य, उदावर्त, यकृत, प्लीहा रोग में लाभ करता है ! इसके सेवन से भूख लगती है ! व पाचन शक्ति को बल मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम, दिन में दो बार गर्म पानी के साथ !!

           *!! प्रवाहिकाहर चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह अतिसार, रक्तातिसार, संग्रहणी, प्रवाहिका में शीघ्र लाभ करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ५ से ८ ग्राम, दिन में दो बार छाछ के साथ !!

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आयुर्वेदिक चूर्ण भाग १

🌺🙏🏻🌺 *!! आयुर्वेदिक चूर्ण भाग १ !!* 🌺🙏🏻🌺

            *!! वैश्वानर चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* ‌‌‌यह चूर्ण दस्त, शूल, सूजन, जोड़ों के दर्द में लाभकारी है ! ‌‌‌यह चूर्ण रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ता है !!

*संघटक -*
सेंधा नमक ,, २ भाग
अजवायन ,, २ भाग
अजमोदा ,, ३ भाग
सुंटी ,, ५ भाग
हरीतकी ,, ५ भाग

*मात्रा व अनुपान -* ‌‌‌१ से ३ ग्राम, दिन में एक या दो बार, खाना खाने के बाद या पहले !
जोड़ों के दर्द में दूध या गर्म पानी के साथ !
‌‌‌‌‌‌अपच में छाछ के साथ !
आमाश्य संवेदनशील मरीज इसे घी के साथ लें !!

            *!! व्योषादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह प्यास अरूचि, ज्वरातिसार, प्रमेह, संग्रहणी, गुल्म, प्लीहा, कामला, पांडु और शोथ आ​दि में लाभकारी है ! यह आवाज साफ
करता है ! इसके सेवन से दस्त रूकते हैं !!
*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार !!

           *!! शतपत्र्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह कब्ज, मुँह के छाले, अम्लपित्त व पेट की खराबी को शीघ्र नष्ट कर आंतरिक गर्मी को शांत करता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन मे दो बार ठण्डे पानी के साथ !!

           *!! शतपुष्पादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से पाचक पित्त को प्रदीप्त कर पाचन क्रिया को सुधारता है ! यह पेचिश, आँव, पेट दर्द, आंतों की मरोड़ आदि में भी लाभदायक है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ४ ग्राम, दिन में दो बार छाछ के साथ !!

           *!! शतावर्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह चूर्ण पौष्टिक, श्रेष्ठ, बाजीकरण और उत्तम वीर्य-वद्​र्धक है !!
      इस चूर्ण के सेवन से रस-रक्तादि सप्तधातुओं की वृद्धि हो कर पौरूष शक्ति बढ़ती है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, दिन में दो बार दूध के साथ !!

           *!! शान्तिवर्धक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के सेवन से मन्दाग्नि , भूख न लगना , जी मिचलाना, अपचन, अफारा, अम्लपित्त और समस्त प्रकार के उदरशूल आदि विकार नष्ट होते हैं ! यह स्वाद में रूचिकर है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम , भोजन के बाद पानी के साथ या बिना पानी के सीधा भी खाया जा सकता है !!

          *!! शिवासार पाचन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से अजीर्ण, कब्ज, अफारा, हिचकी, वमन, अरूचि, शूल, कृमि आदि रोग नष्ट होते हैं ! यह उदर वायु में विशेष लाभ करता है ! इसके सेवन से पेट की वायु बाहर निकलती है व उदर कृमियों को नष्ट करने वाला है ! यह चूर्ण पाचक अग्नि प्रदीपक, यकृत शक्ति वद्​र्धक और सारक है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार भोजन के बाद हल्के गर्म पानी के साथ !!

            *!! शीतोपलादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह श्वास, खाँसी, क्षय, हाथ और पैरों की जलन, अग्निमांद्य, जिव्हा की शून्यता, पसली का दर्द, अरूचि, ज्वर, उध्​र्वगत रक्त-पित्त और नाक व मुंह से खून आना में लाभ करने वाला है ! यह छाती में जमा कफ को बाहर निकाल राहत प्रदान करता है ! इसका विशेष उपयोग खाँसी, सांस, जुकाम, ज्वर आदि में किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ ग्राम, दिन में दो बार शहद के साथ !!

             *!! श्रृंग्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* बालकों के श्वास, खांसी, अतिसार, ज्वर में !!

*मात्रा व अनुपान -* ५०० से १००० मिलीग्राम, दिन में दो बार शहद के साथ !!

              *!! सामुद्रादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से समस्त प्रकार के उदर रोग, गुल्म रोग, अजीर्ण वायु प्रकोप, कठिन ग्रहणी रोग, दुष्ट अर्श, पांडु रोग और अति कष्टदायक भगंदर रोग नष्ट होते हैं !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार !!

             *!! सारस्वत चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* दिमाग के दोषों को दूर करता है !!
बुद्धि व स्मृति बढ़ाता है ! अनिद्रा या कम निद्रा में लाभदायक ! विद्यार्थियों एवं दिमागी काम करने वालों के लिए उत्तम ! इसके सेवन से उन्माद अपस्मार, मस्तिष्क की कमजोरी, स्मरण शक्ति की हीनता आदि में लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में दो बार !!

          *!! सिर दर्द नाशक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* हल्का दस्तावर है ! बिना तकलीफ के पेट साफ करता है ! खून साफ करता है ! तथा नियमित व्यवहार से बवासीर में लाभकारी !!
      इस चूर्ण के सेवन से पित्त और रक्तजन्य सिर दर्द में आराम होता है व निद्रा लाने वाला है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ४ ग्राम, दिन में दो बार !!

          *!! सुखविरेचन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह कब्ज को नष्ट करने वाला है ! इसके सेवन से जठराग्नि प्रदीप्त होती है ! व आँव का पाचन होता है ! इससे किसी प्रकार की आंतों में जलन नही होती !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, रात को सोते समय गर्म पानी के साथ !!

              *!! सैंधवादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* अग्निवर्द्धक, दीपन व पाचन !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ३ ग्राम प्रातः व सायंकाल पानी अथवा छाछ से !!

              *!! हरीतकी चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* ‌‌‌हरीतकी को हरड़ भी कहते हैं ! इसमें मधुर, तिक्त और कषाय रस होता है ! हरीतकी चूर्ण के सेवन से वातिक पांडु में विशेष लाभ होता है !! हरीत की का सेवन नमक के साथ करने से कफ व शहद के साथ सेवन करने से अम्लपित्त में बहुत लाभ मिलता है ! यह भूखवद्र्धक, मुंह के छाले नाशक, कब्ज नाशक है !!

*मात्रा व अनुपान -* इसके गुणों का लाभ लेने के लिए विभिन्न ऋतुओं में इसका सेवन इस प्रकार करना चाहिए !!

🔘वर्षा ऋतु में सेंधा नमक के साथ !!
🔘शरद ऋतु में शकर के साथ !!
🔘हेमंत ऋतु में सोंठ के साथ !!
🔘शिशिर ऋतु में पीपल के साथ !!
🔘वसंत ऋतु में शहद के साथ !!
🔘ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ !!

          *!! हिंग्वष्टक चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* पेट की वायु को साफ करता है ! तथा अग्निवर्द्धक व पाचक है ! अजीर्ण , खट्टी डकारें आना मरोड़, ऐंठन , पेट में गुड़गुड़ाहट , पेट का फूलना , पेट का दर्द , भूख न लगना , वायु रुकना , दस्त साफ न होना , अपच के दस्त आदि में पेट के रोग नष्ट होते हैं ! तथा पाचन शक्ति ठीक काम करती है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ तक ४ ग्राम पानी के साथ !!

                *!! हृद्य चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इसके सेवन से दिल की कमजोरी, अनियमित धड़कन आदि में लाभ मिलता है ! हृदय रोग के फलीभूत शरीर में सूजन आ जाने पर आरोग्यवद्​र्धनी बटी के साथ इसका सेवन करने से विशेष लाभ मिलता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १२५ से २५० मिलीग्राम , दिन में दो
बार शहद के साथ !!

             *!! हिंग्वादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह पाश्​र्वशूल, हृदय शूल, वस्तिशूल, वात-कफज, गुल्म, अफारा, ग्रहणी, अरूचि, छाती की धड़कन, श्वास, कास और स्वरभंग अर्थात आवाज बैठ जाना आदि रोगों में लाभदायक है। यह दीपक, पाचक और रेचक है !!

*मात्रा व अनुपान -* २ से ४ ग्राम, दिन में २ बार गर्म पानी या छाछ के साथ !!

            *!! सुखविरेचन चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह कब्ज को नष्ट करने वाला है ! इसके सेवन से जठराग्नि प्रदीप्त होती है व आँव का पाचन होता है ! इससे किसी प्रकार की आंतों में जलन नही होती !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ से ६ ग्राम, रात को सोते समय गर्म पानी के साथ !!

           *!! विदार्यादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह उत्तम, पौष्टिक एवं बलवीर्यवद्​र्धक योग है ! इस चूर्ण के सेवन से वीर्य-वृ​द्धि, स्तम्भन तथा कम उत्तेजना उत्पन्न होती है ! यह शीघ्र पतन को रोकता है !!

*मात्रा व अनुपान -* ३ ग्राम, दिन में दो बार, भोजन के तीन घण्टे पहले गाय के गर्म दूध के साथ !!

            *!! विडन्गादि चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के उपयोग से आन्त्र कृमि जड़मूल से समाप्त हो जाते है !!

*संघटक -* वाय विडन्ग, सेन्धा नमक, शुद्ध हीन्ग, काला नमक, कबीला, बड़ी हरड, छोटी पीपल, निशोथ की जड़ की छाल को बराबर भाग लेकर महीन चूर्ण बना लें !!

*मात्रा व अनुपान -* ‌‌‌१ से ३ ग्राम, दिन में दो-तीन बार, गुनगुने पानी या छाछ के साथ !!

          *!! लवण भास्कर चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* यह स्वादिष्ट व पाचक है तथा आमाशय शोधक है। यह मन्दाग्नि, अजीर्ण, उदर रोग, क्षय, अर्श ग्रहणी कुष्ट, विबंध, शूल वातकफज गुल्म, तिल्ली, आम-विकार आदि में लाभ करता है !!
        मन्दाग्नि और संग्रहणी रोग की यह उत्कृष्ट दवा है ! वात-पित-कफ इनमें से कोई भी दोष प्रदान होने के कारण मन्दाग्नि या संग्रहणी हो तो इसके सेवन से दूर हो जाती है ! बवासीर, सूजन, शूल, श्वास, आमवात आदि में उपयोगी ! इसका प्रयोग साधारणतय: भी किया जाता है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ से ३ ग्राम, दिन में दो बार भोजन के बाद ठण्डे पानी या छाछ के साथ !!

            *!! लाई चूर्ण !!*

*गुण व उपयोग -* इस चूर्ण के सेवन से संग्रहणी शूल, अफारा अतिसार व मन्दाग्नि में लाभ मिलता है ! इसके सेवन से पाचन शक्ति बढ़ कर भूख खुलकर लगती है !!

*मात्रा व अनुपान -* १ ग्राम, दिन में दो बार छाछ के साथ !!

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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

यूरिक एसिड

🌺🙏🏻🌺 *!! यूरिक एसिड का गड़बड़ होना !!* 🌺🙏🏻🌺

आज हम आपको यूरिक एसिड के लिए दो अनुभूत नुस्खे बता रहे हैं ! आजकल यह समस्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है !!
       इलाज के नाम पर डॉक्टर लोग केवल आपकी जेब खाली करने में लगे हुए हैं ! हमारे सदियों पुराने आयुर्वेद में इसका इलाज बहुत ही आसानी से घरेलु नुस्खों द्वारा बताया गया है ! आज हम आपको उन्ही नुस्खों में से हमारे द्वारा अनुभूत दो नुस्खे बता रहे हैं !!

*!! यूरिक एसिड क्या होता है !!*

      यदि किसी कारणवश गुर्दे की छानने की क्षमता कम हो जाए तो यह यूरिया- यूरिक एसिड में बदल जाता है ।जो बाद में हड्डियों में जमा हो जाता है जिसके कारण पीड़ित व्यक्ति को जॉइंट में दर्द रहने लगता है !!
        यूरिक एसिड प्यूरिन के टूटने से बनता है ! वैसे तो यूरिक एसिड शरीर से बाहर पेशाब के रूप में निकल जाता है ! परन्तु यदि किसी कारण वश जब यूरिक एसिड शरीर में रह जाए तो धीरे-धीरे इसकी मात्रा ही आपके शरीर के लिए नुकसान दायक हो जाती है।यह अधिकांश आपके हड्डियों के जोड़ो में इकठ्ठा होने लगता है जिसके कारण आपको ज्वाइंट पैन होने लगते हैं !!

*!! उच्च यूरिक एसिड के नुकसान !!*

*१ :-* इसका सबसे बड़ा नुकसान है शरीर के छोटे जोड़ों मे दर्द जिसे गाउट रोग के नाम से जाना जाता है !!

*२ :-* पैरो-जोड़ों में दर्द होना !!

*३ :-* पैर एडियों में दर्द रहना !!

*४ :-* गांठों में सूजन !!

*५ :-* जोड़ों में सुबह शाम तेज दर्द कम-ज्यादा होना !!

*६ :-* एक स्थान पर देर तक बैठने पर उठने में पैरों एड़ियों में सहनीय दर्द ! फिर दर्द सामन्य हो जाना !!

*७ :-* पैरों, जोड़ो, उगलियों, गांठों में सूजन होना !!

*८ :-* शर्करा लेबल बढ़ना !!

    उपर्युक्त निम्न तरह की समस्या होने पर तुरन्त यूरिक एसिड जांच करवायें !!

*!! युरिक एसिड की आयुर्वेदिक दवा !!*

*नुस्खा नम्बर १ :-*
त्रिफला- २५० ग्राम,
गिलोय चूर्ण - २०० ग्राम !
कलोंजी- १००ग्राम,
मैथी पीसी - १०० ग्राम,
अजवायन - १०० ग्राम,
अर्जुन छाल चूर्ण - १०० ग्राम,
चोबचीनी - १०० ग्राम,
२००ग्राम एलोवेरा रस में सभी चूर्ण को मिलाकर छावं में सुखाए ! व चूर्ण कर लें !!

*सेवन की विधि :-*
     २१ दिन से ९० दिन तक दिन में ३ बार २ से ५ ग्राम चूर्ण सेवन करें !!

*नुस्खा नम्बर २ :-*
छोटी हरड का पावडर - १०० ग्राम,
बड़ी हरड का पावडर - १०० ग्राम,
आवंला का पावडर - १०० ग्राम,
जीरा का पावडर -१०० ग्राम,
गिलोय का पावडर - २०० ग्राम,
अजवायन - १०० ग्राम,
        इन सभी को आपस में मिला लीजिये !!
         प्रतिदिन ५ ग्राम सुबह और ५ ग्राम शाम को पानी से निगल लीजिये ! यूरिक एसिड नार्मल होते देर नहीं लगेगी !!
        लेकिन सावधान आपको लाल मिर्च का पावडर और किसी भी अन्य खटाई, अचार का सेवन बिल्कुल नहीं करना है !!

*!! हाई यूरिक एसिड में क्या खाये और नहीं खाना चाहिए !!*

       प्यूरिन की वजह यूरिक एसिड हाई होता है ! इसलिए खाने पीने ऐसी चीजों के सेवन से दूर रहे जिनसे प्यूरिन बनता है ! जेसे रेड मीट, ऑर्गन मीट, फिश और सी फुड !!

*१ :-*  दूध कम फैट वाला ही पिए !!

*२ :-* जैतून के तेल में खाना बनाये !!

*३ :-*  डिब्बा बंद खाना खाने से बचे ! पता नही कब का पैक है !!

*४ :-*  विटामिन सी युक्त चीजों का सेवन करे !!

*५ :-*  बियर और शराब के सेवन से परहेज करे !!

*६ :-* जिन चीजों में फाइबर की मात्रा अधिक हो ऐसी चीज खाये !!

*७ :-* ओमेगा -3 फैटी एसिड का यूरिक एसिड में परहेज करे !!

*८ :-* नींबू पानी शरीर को साफ़ करता है ! और क्रिस्टल्स घोलता है !!

*९ :-* पेस्ट्री, केक और पैनकेक जैसे बेकरी उत्पादों के सेवन से बचे !!

*१० :-* जामुन, चेरी और स्ट्रॉबेरी जैसे फल गठिया का इलाज करने और यूरिक एसिड को बाहर निकालने में मदद करते है !!

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स्वर्ण सिन्दूर !!*

🌺🙏🏻🌺 *!! स्वर्ण सिन्दूर !!* 🌺🙏🏻🌺

*गुण व उपयोग :-* स्वर्ण सिन्दूर का अनेक रोगों में सेवन करने से लाभ मिलता है ! यह धातु, मेधा, कान्ति, अग्नि, बल, आयु व काम-शक्ति की वृद्धि करता है !!
        मस्तिष्क संबंधी दुर्बलता के लिये यह उत्तम रसायन है ! अनुपान भेद से मकरध्वज की तरह यह अनेक रोगों में फायदा देता है !!
        इसके सेवन से बल वीर्य, स्मरण शक्ति और कान्ति बढ़ती है। यह साधारण ज्वर, सन्निपात ज्वर, सर्दी, जुकाम-खाँसी, मन्दाग्नि, संग्रहणी, अम्लपित्त, प्रमेह, सूतिका रोग आदि में बहुत लाभकारी है ! इसके नियमित सेवन करने से धातु संबंधी रोग ठीक होते हैं ! यह उत्तम रसायन और बाजीकरण है !!

*मात्रा व अनुपान :-*
६५.५ मिलीग्राम से १२५ मिलीग्राम, शहद, मक्खन, मिश्री, मलार्इ आदि के साथ !!

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श्वासचिन्तामणि रस (बृहत्)*

🌺🙏🏻🌺 *!! श्वासचिन्तामणि रस (बृहत्)* 🌺🙏🏻🌺

*गुण व उपयोग :-* इसके सेवन से पुराने और कठिन श्वास रोग, खाँसी, जुकाम, ज्वर आदि में उत्तम लाभ मिलता है ! इसमें स्वर्ण भस्म, लौह भस्म, शुद्ध गन्धक, अभ्रक भस्म, मुक्तापिष्टी, स्वर्ण माक्षिक भस्म आदि घटक द्रव्य होते हैं ! यह श्वास संस्थान की विकृति एवं फेफड़ों की दुर्बलता को नष्ट कर श्वास और खाँसी रोग को निर्मूल कर देता है !!

*मात्रा व अनुपान :-* १ से २ गोली, सुबह-शाम शहद के साथ या चिकित्सक के परामर्श अनुसार !!

*विशेष :-* श्वासचिन्तामणि रस (बृहत्) के साथ च्यवनप्राश का सेवन करने से लाभ में वृद्धि होती है !!

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मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

ब्रेन मलेरिया, टाइफाईड, चिकुनगुनिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, इन्सेफेलाइटिस, माता व अन्य प्रकार के ब

मित्रो ब्रेन मलेरिया, टाइफाईड, चिकुनगुनिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, इन्सेफेलाइटिस, माता व अन्य प्रकार के बुखार का इलाज पढ़े( Fever)
मित्रो ब्रेन मलेरिया, टाइफाईड, चिकुनगुनिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, इन्सेफेलाइटिस, माता व अन्य प्रकार के बुखार का इलाज पढ़े।
मित्रो बहुत सारे बुखार तेजी से भारत देश मे फैल रहे है । करोडो की संख्या मे लोग इससे प्रभावित हो रहे है। और लाखों लोग मर रहे है। हमेशा की तरह सरकार हाथ पर हाथ रखे तमाशा देख रही है।
श्री राजीव दीक्षित जी ने गाँव-गाँव घूम-घूम कर आयुर्वेदिक दवा से लाखो लोगो को बचाया है।। और ये दवा बनानी कितनी आसान है।
20 पत्ते तुलसी, नीम की गिलोई का सत् 5gm, 10gm सोंठ (सुखी अदरक), 10 छोटी पीपर के टुकड़े सब आपके घर मे आसानी से उपलब्ध हो जाती है। एक जगह पर कूटने के बाद एक गिलास पानी में उबलकर काढ़ा बनाना है ठन्डा होने के बाद में सुबह, दोपहर और श्याम दिन में तीन बार पीना चाहिए।
नीम गिलोई- इसका जूस डेंगू रोग में श्वेत रक्त कणिकाए, प्लेटलेट्स कम होने पर तुरंत बढ़ाने में ये गिलोय ज्यादा बहुत काम आता है।
इनके प्रयोग से आप रोगी की जान बचा सकते हैं। मात्र इसकी 3 खुराक से राजीव भाई ने लाखों लोगो को बुखार से मरने से बचाया था ।।
अपना अनमोल जीवन और पैसा बचाइए ।

जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कमर का दद, कंधे की जकड़न, कर दर्द, एक टांग मे दर्द

जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कमर का दद, कंधे की जकड़न, कर दर्द, एक टांग मे दर्द
जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कमर का दद, कंधे की जकड़न, कर दर्द, एक टांग मे दर्द (साइटिका/रिंगन बाय/ गृध्रसी), गर्दन का दर्द (सरवाईकाल स्पोंदिलाइटिस) आदि की हानि रहित सुरक्षित चिकित्सा।
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ये चिकित्सा आयुर्वेद विशेषज्ञ “श्री श्याम सुंदर” जी ने अपनी पुस्तक रसायनसार मे लिखी हैं। कोई भी आयुर्वेदिक तेल जैसे महानारायण तेल, आयोडेक्स, मूव, वोलीनी आदि इसके समान प्रभावशाली नहीं है। एक बार आप इसे जरूर बनाए।
सामान – कायफल =250 ग्राम , तेल (सरसों या तिल का)=500 ग्राम
कायफल- “यह एक पेड़ की छाल है” जो देखने मे गहरे लाल रंग की खुरदरी लगभग 2 इंच के टुकड़ों मे मिलती है। ये सभी आयुर्वेदिक जड़ी बूटी बेचने वाली दुकानों पर कायफल के नाम से मिलती है। इसे लाकर कूट कर बारीक पीस लेना चाहिए। जितना महीन/ बारीक पीसोगे उतना ही अधिक गुणकारी होगा।
बनाने की विधि – एक लोहे/ पीतल/ एल्यूमिनियम की कड़ाही मे तेल गरम करें। जब तेल गरम हो जाए तब थोड़ा थोड़ा करके कायफल का चूर्ण डालते जाएँ। आग धीमी रखें। जब सारा चूर्ण खत्म हो जाए तब कड़ाही के नीचे से आग बंद कर दे। एक कपड़े मे से तेल छान ले। जब तेल ठंडा हो जाए तब कपड़े को निचोड़ लें। इस तेल को एक बोतल मे रख ले। कुछ दिन मे तेल मे से लाल रंग नीचे बैठ जाएगा। उसके बाद उसे दूसरी शीशी मे डाल ले। अधिक गुणकारी बनाने के लिए इस साफ तेल मे 25 ग्राम दालचीनी का मोटा चूर्ण डाल दे। जो कायफल का चूर्ण तेल छानने के बाद बच जाए उसी को हल्का गरम करके उसी से सेके। उसे फेकने की जरूरत नहीं। हर रोज उसी से सेके।
जहां पर भी दर्द हो इसे हल्का गरम करके धीरे धीरे मालिश करें। मालिश करते समय हाथ का दबाव कम रखें। उसके बाद सेक जरूर करे। बिना सेक के लाभ कम होता है।
मालिस करने से पहले पानी पी ले। मालिश और सेक के 2 घंटे बाद तक ठंडा पानी न पिए। प्यास लगे तो गरम दूध पिए

नाखून सड़ना ,पेरोनिसिया ,हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना.

  पेरोनिसिया  हात पैर के नाखून सडणा/ खराब होना. आयुर्वेदिक  मुलेठी 50ग्राम बडी सोफ 50 ग्राम  अच्छी हळदी 50 ग्राम  नीम पत्ते चुर्ण 50 ग्राम  ...